071 Pratadvoched

मूल स्तुति

प्र तद्वो॑चेद॒मृतं॒ नु वि॒द्वान् ग॑न्ध॒र्वो धाम॒ बिभृ॑तं॒ गुहा॒ सत्।

त्रीणि॑ प॒दानि॒ निहि॑ता॒ गुहा॑स्य॒ यस्तानि॒ वेद॒ स पि॒तुः पि॒ताऽस॑त्॥२४॥

व्याख्यानहे वेदादिशास्त्र और विद्वानों के प्रतिपादन करने योग्य जो अमृत (मरणादि दोषरहित) मुक्तों का धाम निवासस्थान, सर्वगत, सबका धारण और पोषण करनेवाला, सबकी बुद्धियों का साक्षी ब्रह्म है, उस आपका उपदेश तथा धारण जो विद्वान् जानता है, वह गन्धर्व कहाता है (गच्छतीति गं=ब्रह्म, तद्धरतीति स गन्धर्वः) सर्वगत ब्रह्म को जो धारण करनेवाला उसका नाम गन्धर्व है तथा परमात्मा के तीन पद हैंजगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करने का सामर्थ्य को तथा ईश्वर को जो स्वहृदय में जानता है, वह पिता का भी पिता है, अर्थात् विद्वानों में भी विद्वान् है॥२४॥