07. चारणोद कर्नाली में

7 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- शुद्ध चैतन्य जी, ऐसे योग्य गुरु की तलाश में थे, जो उन्हें संन्यास की आश्रम की दीक्षा देकर सच्चे शिव की रह दिखा सकें। आयु कम होने से कोई संन्यास देने को तयार नहीं होता था।

वीर छन्द :-

चारणोद कर्नाली में एक संत पूर्णानंद जी रहते थे।

दो मुझको वैराग्य ये बिनती शुद्ध चैतन्य जी करते थे।।

सौम्य स्वभाव बुद्धि अति उत्तम, गुण वैराग्य बताते थे।

ब्रह्मचारी की देख लगन को, मन ही मन हरषाते थे।।

पूर्णानंद सरस्वती जी ने, मन में निश्चय कर लीन्हां।

देकर के संन्यास की दीक्षा, नाम दयानंद रख दीन्हां।।

वही दयानंद ऋषि बन गया, भारत के इतिहास में।

वेदों का उद्धार कर गया, दुनिया के आकाश में।।

ज्वालानंद शिवानंद गिरी से, रहस्य योग का जान लिया।

कृपण शास्त्री से व्याकरण की विद्या का गुर सीख लिया।।

अहमदाबाद दुधेश्वर मंदिर, माउण्ट आबू गए श्रीमान।

संवत उन्नीससौ बारह में, हरिद्वार कीन्हा प्रस्थान।।