06. लगन नहीं छूटे

6 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- मूल जी पहचान जाने के भय से छुपते-छुपाते अपनी मंजिल की ओर आगे बढ़ते ही जाते हैं । उनके शरीर पर कीमती आभूषण भी थे।

राग जोगिया :-

लगन नहीं छूटे जब दिल में लागी। टेक

राह चलत मिले ठगीया साधू,

कहाँ लगे यूं डाल के जादू।

कौन धाम क्या नाम विचारों,

आभूषण से क्यों प्रेम तुम्हारों।

इन्हें उतार बनों वैरागी । लगन नहीं..

शुद्ध चौतन्य नाम रख दीन्हां,

स्वेत वस्त्र कर तुम्बा दीन्हां।

बड़े दुःख इस तन पर झेले,

कोट कांगड़ा सिद्धिपुर मेले।

कहीं तो मिलेगा परम अनुरागी। लगन नहीं..

पिताजी खबर सुनकर मेले में आए।

सूत को पकड़ बैन कड़वे सुनाए।

सिपाही बुला सख्त पहरा बिठाए।

करो चौकसी भागकर फिर न जाए।

सोए सभी नींद उसको न लागी। लगन नहीं..

गया भाग पहरे से घर को न जाना,

प्रभु की शरण में अमर पद को पाना।

कभी मोह-ममता को दिल में न लाना,

उसी को मिला है प्रभु का ठिकाना।

नर्मदा के तट पर गया वीतरागी। लगन नहीं..