05. शादी के दिन निकट

5 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- इस प्रकार बालक मूल शंकर दिन ब दिन चिन्तित रहने लगा। माता पिता को यही उचित लगा कि जितना जल्दी हो सके इसको शादी के बन्धन में बांध दिया जाए। शीघ्र ही आनन-फानन में शादी की त्यारियां होने लगी।

वीर छन्द :-

शादी के दिन निकट आ गए घर में छाई ख़ुशी अपार।

मात-पिता परिवार बन्धुजन मिलकर कारज रहे संवार।।

व्याकुल मन एकांत वास में, मूल जी हरदम करें विचार।

एक दिन काल मुझे खाएगा, ऐसे जीवन में क्या सार।।

योगी बनकर निडर रहूं मैं, शंका करूं काल की नाय।

मात- पिता से नाता तोडूं घर को तुरत देऊं बिसराय।।

बाईस वर्ष की भरी जवानी, यौवन से टूटा अनुराग।

काम वृत्ति को आहुति दे दी, गहरी लगन तीव्र वैराग्य।।

रात्रि अँधेरी मंजिल करके, पंहुचे बीस कोस एक ग्राम।

हनुमान जी के मंदिर में उस दिन जाए किया विश्राम।।

वार्ता :- इस तरह बालक मूल शंकर ने तीव्र वैराग्य के वशीभूत होकर सच्चे शिव की खोज में स्वगृह को त्याग दिया । उधर उनके परिवार की क्या दशा होती है?

लामिनी :-

खबर सुन माँ के दिल पर बिजली गिरी दह्लाए।

मीन जल बिन के तड़पे माता रही अकुलाए।।

पिता के होश उड़ गए, चेहरा रहा कुम्हिलाए।

बन्धुजन शोक मनाएं, विपदा ये कैसी आए।

रंग सब फीके पड़ गए। घर में उदासी छाए।।

तुरत घोड़े दौडाए, सुत खोजो कहीं जाए।।

पिंजड़ा तोड़ पक्षी उड़ जावे।

फिर न लौट कभी वहां आवे।।

एक दिन उड़े ताल के हंस फेर नहीं आएंगे। फेर नहीं आएंगे।