04. इस घटना के बाद

4 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- इस चूहे की घटना ने बालक मूल शंकर को विचलित कर दिया। सच्चे शिव दर्शन की भावना बलवती होने लगी।

बारहमासी :-

इस घटना के बाद पुत्र की चिंता बढ गई है।

खो-खो रहे रात्रि की निद्रा उड़ गई है।

सोच दिन रत करे भारी।

पत्थर को भगवान समझ रही ये दुनिया सारी।

बहिन की मृत्यु हुई घर में।

आंसू पीकर खड़े मूल जी सोच करें मन में।

मौत से सब डरते भाई।

है क्या ऐसी चीज बनी जो सबको दुःखदाई।

गजब एक और भयो भारी।

सबसे प्यारे चचा आ गई अब उनकी बारी।

मृत्यु की देख भयंकरता।

कैसे इससे बचूं बढ़ गई दिल में व्याकुलता।

मूल जी मन में सोच किया।

बिना त्याग वैराग्य किसी को मिला नहीं पिया।

प्रभु उपकार है बहुत किया।

करने को उद्धार विश्व का बिज डाल दिया।

वार्ता :- बालक मूल शंकर को, मृत्यु ने इतना, भयभीत कर दिया कि वह मृत्यु से बचने के उपाय सोचने लगा, संसार असार लगने लगा, पारिवारिक बंधनों से विमोह पैदा होने लगा।

राग लांगुरिया :-

अब नर छोड़ जगत के फेर, देर ना तेरे जाने में।

नौ दस मास गर्भ में रहता,

पैदा होए काल खा जाता।

जन्म मरण का चक्र घूमता, उम्र बिताने में। अब नर..

बालापन हंस खेल गवाया।

होकर बड़ा बहुत गर्वाया।

काया जर-जर होए लगा क्यों इसे सजाने में। अब नर..

सुन्दर तन अग्नि में जलता,

सब कुछ पड़ा यहीं रह जाता।

फिर कैसा अभिमान अरे नर देख ज़माने में। अब नर..

प्रभु का नाम, सुमिर के बन्दे,

छोड़ सभी ये गोरखधन्धे।

भव सागर में पड़ा हुआ क्यों उम्र गवाने में। अब नर..

व.त. :-

मूल शंकर के वैराग्य दिल में बसा,

मोह ममता से चित्त अलग कर लिया।

अब न शादी के बन्धन बंधुंगा कभी,

धार ऐसा कठिन व्रत मन में लिया ।। टेक।।

घर में शादी की होने लगी तयारियां,

राह अपनी को बालक लगा खोजने,

किस दिशा में गमन कर मिलेगा प्रभु?

कौन बतालाए लगा उसको सोचने ।। १।।