03. आचमन

अथाचमन-मन्त्राः

3म् अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा।। 1।। इससे एक

3म् अमृतापिधानमसि स्वाहा।। 2।। इससे दूसरा

3म् सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा।। 3।।

                        (तैत्तिरीय आरण्यक प्र. 10/अनु. 32, 35)