01. ओम् नाम सबसे बड़ा

1 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

ओ३म् विश्वानि देव् सवितर्दुरितानि परासुव। यद् भद्रन्तन्न आसुव ।।

ओम् नाम सबसे बड़ा, जग का पालन हार।

जो इसका सुमिरन करे, है जाए भव से पार।।

चौबौला :-

है जाए भव से पार, जगत का पूर्ण हितकारी है।

पाप पुण्य का यथा योग्य, फल देय न्यायकारी है।

पूर्ण व्यवस्थित ज्ञान युक्त, यह रची सृष्टि सारी है।

दुष्टों को दे दंड प्रभु तू बड़ा बलंकारी है।।

जगत के पालन कर्ता! दुःख भक्तों के हर्ता !।

दयानंद गाथा गाऊं,

सच्चिदानंद स्वरूप को बार-बार शिर नाऊं।।

वार्ता :- ऋषि दयानंद सरस्वती भारत माता के ऐसे अनमोल रत्न थे, जिन्होंने गुलामी से ग्रसित भारत के सपूतों की अस्मिता को ललकारा। देश का स्वाभिमान की रक्षा के लिए लाखों कष्ट उठाए। मानव निर्माण हेतु वेदों का सन्मार्ग दिखाते हुए आर्य समाज रूपी वट वृक्ष की स्थापना की। उस महामानव (नरपुंगव) की जीवनी का उल्लेख (वर्णन) काव्य गाथा के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

वीर छन्द :-

जगदीश्वर का सुमिरन कर लो, जिसने रचा सकल संसार।

अनुपम रूप भरा सृष्टि में, महिमा जिसकी अपरम्पार।।

सुंदर तन मानव को दीन्हा, दीन्ही बुद्धि विशेष प्रकार।

अमृत ज्ञान दिया वेदों का, जिससे खुले मुक्ति के द्वार।।

वेदों के पथ पर चलने से, सबका शुद्ध होए व्यवहार।

भूल जाए जो इस मार्ग को, वह नर डूब जाए मंझधार।।

ऐसी दशा हुई भारत की, घोर अविद्या का अन्धकार।

पराधीन भारत की जनता, बने विदेशी साहूकार।।

धर्म-कर्म सब नष्ट हो गए, फ़ैल रहा था अत्याचार।

आर्य जाति का पतन हो रहा, पाखण्डों की थी भरमार।।

भाई का भाई दुश्मन था, खून की नदियां रहा बहाय।

घात लगाके घुसे विदेशी, हमको दिया गुलाम बनाए।।

घोर अविद्या अंधकार में, भारत माता रही अकुलाए।

ऐसे विकट समय भारत में लीन्हा जन्म दयानन्द आए।