01. अग्निहोत्र प्रस्तावना

देनेवाला देवता है। देवता दो प्रकार के हैं– जड और चेतन। चेतन देवों की पूजा को पंचायतन पूजा कहते हैं, तो जड़ देवों की पूजन विधि को अग्निहोत्र या हवन या देवयज्ञ कहते हैं। धरती, पानी, हवा, अन्न आदि जड़ देव हैं। इनसे निरन्तर हम लाभ उठाते हैं। इन जड़ देवों को प्रदूषित भी हम ही करते रहते हैं। हवन से पर्यावरण प्रदूषण को समाप्त किया जा सकता है। यह एक वैज्ञानिक कर्म है। अग्नि की यह विशषता है कि इस में डाले गए पदार्थ को यह परमाणू स्तर तक सूक्ष्म कर देता है। इतना ही नहीं उन पदार्थों की शक्तियों को हजारों गुना बढ़ा देता है। हवन में चार प्रकार की वस्तुएं डाली जाती हैं। पहला है सुगन्धित, दूसरा रोगनाशक, तीसरा पौष्टिक एवं चौथे मीठे पदार्थ। हवन करने से केवल पर्यावरण की शुद्धि मात्र होती हो ऐसा नहीं है। हम मन्त्रों को बोलकर ईश्वर की स्तुति प्रार्थना उपासना भी इसमें करते हैं। इस का हरेक शब्द हमें अच्छी-अच्छी प्रेरणाएं देता है। हर मन्त्र में बोला जानेवाला ओ3म् हमें ईश्वर में प्रेम विश्वास को जगाता है। स्वाहा शब्द हमें त्याग करना सिखाता है। हम स्वार्थी न बनकर परोपकारी बन जाते हैं। इदन्न मम शब्द हमारे अन्दर वैराग्य को जगाता है तथा संसार से मोह कम कराता है। हवन की ऊपर उठती हुई लपटें हमें सदा प्रगतिशील होने तथा ऊपर उठने की प्रेरणा देती है। हवन को नित्य प्रति अपने घर में अपनाने से हमारी इन्द्रियां, मन, बुद्धि तथा आत्मा पवित्र हो जाते हैं। हवन करने से केवल अपना ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व का उपकार होता है।

अथर्ववेद में लिखा है कि प्रातःकाल किए हुए अग्निहोत्र का प्रभाव सायंकाल तक रहता है तथा सायंकाल किए हुए अग्निहोत्र का प्रभाव प्रातःकाल तक रहता है। आज पर्यावरण प्रदूषण समस्या विश्व की सबसे बड़ी समस्या है। एक तरफ बढ़ते ग्लोबल वॉर्मिंग से हिमाच्छादित पर्वतों के पिघलते बर्फ के कारण सागरों में जलस्तर बढ़ रहा है। दूसरी ओर औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण के कारण वन नष्ट किए जा रहे हैं। इधर देश की लगभग सभी प्रमुख नदियों का जल प्रदूषित हो गया है। पर्यावरण असन्तुलन के कारण कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा जैसी स्थितियां हर वर्ष देश में उत्पन्न होती हैं। किसी भी शहर की वायु का परीक्षण किया जाए तो पता चलता है कि यह खतरनाक रूप से यह बिगड़ चुकी है। खाद्यान्न फल सब्जियां मेवे आदि शुद्ध रूप में आज उपलब्ध नहीं है। कृषि में रासायनिक खादों का अत्यधिक प्रयोग एक तरफ अन्नों को विषैला बनाता है दूसरी ओर भूमि की उर्वरा शक्ति को समाप्त कर रहा है। पर्यावरण प्रदूषण के प्रभाव को कम करने के लिए प्रयास तो किए जा रहे हैं। पर वे बहुत कम हैं, मंहगे हैं, आधे अधूरे हैं तथा प्रभावहीन है। जबकि घर-घर हरेक परिवार में यदि हवन किया जाता है तो इस समस्या का अचूक, सबसे सुलभ एवं वैज्ञानिक तथा सबसे सस्ता उपाय होगा। हवन से जो गैसे बनती हैं उसमें विषैली वायु को नष्ट करने का सामर्थ्य होता है। हानीकारक जीवाणुओं वायरसों को समाप्त भी करती है। हवन की धूम से न केवल वायुशुद्धि अपितु पर्जन्य भी शुद्ध होने से अन्नादि की शुद्धि भी सम्भव हो पाती है। वैसे भी प्रत्येक मनुष्य मल, मूत्र, श्वास, द्वारा पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है। कलकारखानों की चिमनियों निकलता धुँआ मोटरगाडी आदि के प्रयोग द्वारा मानव पर्यावरण असन्तुलन का जिम्मेदार बनता है। उतनी मात्रा में पर्यावरण सन्तुलन बनाने का दायित्व भी हमारा बनता है। दैनिक अग्निहोत्र द्वारा यह लक्ष्य को हम सहज ही प्राप्त कर सकते हैं।

यज्ञ से पर्यावरण शोधन तो होता ही है साथ साथ यह पारिवारिक संगठन तथा आध्यात्मिक उन्नति का भी कारण है। घर के सारे छोटे-बड़े प्रतिदिन निश्चित समय एकत्र होकर दिव्य भावों से ओतःप्रोत पवित्र वेदमन्त्रों का उच्चारण करते हुए आहूतियां देते हैं। यज्ञ के बाद सभी छोटों द्वारा अपने बड़ों का चरणस्पर्श कर आशीर्वाद लेने की  परम्परा है। इससे परिवार में एक दूजे के लिए त्याग, परस्पर संगठन एवं प्रेम दिन प्रतिदिन बढ़ाता ही है।

होमा थेरेपी नाम से विश्व के कई देशों में यज्ञ द्वारा चिकित्सा भी की जाती है। कृषि क्षेत्र में भी अग्निहोत्र के प्रभाव पर दुनियांभर में कई प्रगत देशों में अनुसंधान किए जा रहे हैं। अमेरिका की अग्निहोत्र विश्वविद्यालय तथा अन्य कतिपय देशों से नियमित रूप से प्रकाशित होने वाली अखबारों पत्रिकाओं में इन संशोधनों की विस्तृत वैज्ञानिक रिपोर्ट समय समय पर छपती रहती है। वैदिक राष्ट्रीय प्रार्थना में कहा है कि हम यज्ञ द्वारा वर्षा को नियन्त्रण में रखें। प्राचीन काल में अतिवृष्टि तथा अनावृष्टि को इस विधा से नियन्त्रित किया जाता रहा है। समय की मांग है कि इस दिशा में व्यापक प्रयोग किए जाएं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि घर में रखा छोटा सा हवनकुण्ड न केवल पर्यावरण का शोधक किन्तु हमारे मानस शोधन, बुद्धि के पवित्रीकरण द्वारा हमारे जीवन को दिव्य महान बनाने का साधन बनता है। इसलिए हवन करो आधुनिक बनो, यज्ञ करो वैज्ञानिक बनो।