06 पञ्चम समुल्लास

ओ३म्

सत्यार्थ प्रकाश कवितामृत
काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी
स्वर : ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर”
ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)
प०चम समुल्लासः
अथ वानप्रस्थसंन्यासविधिं वक्ष्यामः
ब्रह्मचर्य्याश्रमं समाप्य गृही भवेत् गृही भूत्वा वनी भवेद्वनी भूत्वा प्रव्रजेत्।।
– शत0 कां0 14 ।।
दोहा
ब्रह्मचर्य्य समाप्त कर, करे गृहस्थ प्रवेश
वान प्रस्थ सेवे पुन, फिर संन्यासी भेष।।
एवं गृहाश्रमे स्थित्वा विधिवत्स्त्रातको द्विजः।
वने वसेत्तु नियतो यथावद्विजितेन्द्रियः।। 1 ।।
गृहस्थस्तु यदा पश्येद् वलीपलितमात्मनः।
अपत्यस्यैव चापत्यं तदारण्यं समाश्रयेत्।। 2।।
संत्यज्य ग्राम्यमाहारं सर्वं चैप परिच्छदम्।
पुत्रेषु भार्यां निःक्षिप्य वनं गच्छेत्सहैव वा ।।3।।
अग्निहोत्रं समादाय गृह्यं चाग्निपरिच्छदम्।
ग्रामादरण्यं निःसृत्य निवसेन्नियतेन्द्रियः।। 4।।
मुन्यन्नैर्विविधैर्मेध्यैः शाकमूलफलेन वा।
एतानेव महायज्ञान्निर्वपेद्विविधिपूर्वकम्।।5।।
– मनु0 6 । 1-5
चौपाई
स्त्रातक विधि सों भोग गृहस्थी, बन जाये पुन बान प्रस्थी।
शिर के केश होंय जब श्वेता, आये बुढ़ापा रूप विजेता।
पोते का मुख ज्योंही देखे, छोड़ देय सब घर के लेखे।
नगर ग्राम के त्याग आहारा, मीठा लोना चरपर खारा।
बढ़िया अंबर सकल उतारे, केवल सादे वस्तर धारे।
चहें तो पतनी संग ले जाये, अथवा पुत्र पास ठहराये।
बस्ती छोड़ बनों में जाये, सुन्दर पर्ण कुटि में छाए।
अग्नि होत्र गह साङग उपंगा, भगवद्भवित करे सत्संगा।
कंद मूल फल खाए भोजन, उसे खिलाए आए जो जन।
अग्नि होत्र उनही से कीजे, बन जीवन का आनंद लीजे।
स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्याद्दान्तो मैत्रः समाहितः।
दाता नित्यमनादाता सर्वभूतानुकम्पकः।।1।।
अप्रयत्नः सुखार्थेषु ब्रह्मचारी धराशयः।
शरणेष्वममश्चैव वृक्षमूलनिकेतनः ।।2।।
– मनु0 6 । 8 । 26
स्वाध्याय में चित्त लगाये, बृथा न अपना समय गंवाए।
विद्यादिक वस्तुन को देता, कबहुं दान पुण्य नहीं लेता।
इन्द्रिय जित सब का हो प्यारा, मन को वश में राखन हारा।
तन के हित अति जतन अकारी, किन्तु रहे पूरन ब्रह्मचारी।
निज पत्नी यदि होवे संगा, तो भी उठे न काम तरंगा।
दयावान भूमि पर सोवे, निज वस्तुन में निर्मम होवे।
बृक्ष मूल में करे निवासा, उत्तम वानप्रस्थ को वासा।
तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये, शान्ता विद्वांसो भैक्षचर्य्यां चरन्तः।
सूर्य्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति, यत्राऽमृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा।।1।।
– मुण्ड0 खं0 20 । मं0 11
शान्त चित हो जो विद्वाना, करते वन धर्मानुष्ठाना।
भिक्षा माँग उदर को भरते, वे नर भव सागर को तरते।
अविनाशी ईश्वर को पावहिं, प्राण द्वारा सों प्रभु पँह जावहिं।
अभ्यादधामि समिधमग्ने व्रतपते त्वयिं।
व्रत०च श्रद्धां चोपैमीन्धे त्वा दीक्षितो अहम्।।1।।
– यजुर्वेद अ0 20 मं0 24
तप सत्संग योग अभ्यासा, रखे बनी ईश्वर की आसा।
उदय होय जब मन में ज्ञाना, तब संन्यास गहे मनमाना।।
अथ संन्यास विधि
वनेषु च विहृत्यैवं तृतीयं भागमायुषः।
चतुर्थमायुषो भागं त्यक्त्वा सगङान् परिव्रजेत्।।1।।
– मनु0 6 । 33
तृतीय भाग आयु का भाई, इस प्रकार बन माँहि बिताई।
चौथे चरण गहे संन्यासा, केवल रखे ब्रह्म में आसा।
सब संगी सम्बन्धी छोड़े, केवल प्रभु सों नाता जोड़े।।
प्रश्न
जो नहीं प्रथम गृहस्थ कमावे, वानप्रस्थ हो वन नहीं जावे।
तरुणाई में हो संन्यासी, जग में घूमे होय उदासी।।
वाको पाप लगे वा नाँहीं, यह संशय मेरे मन माँहीं।
कृपा करो प्रभु शंक निवारो, डूबहुँ संशय भंवर निकारो।।
उत्तर (दोहा)
लगे पाप नहीं भी लगे, उभय रीत की बात।
संन्यासी होना कठिन, विरला कोऊ निभात।।
चौपाई
वालकपन में गृह को तयागे, पाछे मन विषयन में लागे।
महा पाप उस नर को भाई, ऊँचे चढ़ा गिरा जा खाई।
जो नहीं विषय भोग में फँसा, काग नहीं वह निर्मल हंसा।।
यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेद्वनाद्वा गृहाद्वा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत्।।
चौपाई
जा छिन मन हो जाय विरागी, वीतराग निर्मोही त्यागी।
उसी समय होवे संन्यासी, गृही होय अथवा बनवासी।।
तोड़ फोड़ जग के जंजाला, संन्यासी हो रहे निराला।
करता रहे जगत उपकारा, मोह माया से करे किनारा।।
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः।
नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्।।
– कठ0 । वल्ली 2 । मन्त्र 33
चौपाई
जिससे दुराचार नहीं छूटा, माया का बन्धन नहीं टूटा।
नहीं शान्ति जिसके मन में, लगी लालसा जग द्रव्यन में।।
जाको अन्तःकरण न योगी, नहीं संन्यासी है वह भोगी।
वह संन्यास करे यदि धारण, करता केवल आत्म प्रतारण।
पार ब्रह्म को कबहुं न पावे, चाहे कितना ढोंग रचावे।।
यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेद् ज्ञान आत्मनि।
ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि।।
– कठ0 वल्ली 3 । मं0 13
संन्यासी रोके मन वानी, बिन रोके होवे बहु हानि।
आत्म ज्ञान में इन्हें लगावे, पुन आतम परमातम पावे।
ब्रह्म ज्ञान आतम में लावे, शान्त चित्त में उसे टिकावे।।
परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन।
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्।।
– मुण्ड0 खं0 2 । मं0 12
सकल भोग कर्मों से संचित, फिर भी रहे ज्ञान से वंचित।
अकृत ईश्वर कर्म अगोचर, ज्ञान हेत नर हो गुरु गोचर।।
गुरु बिन कबहुँ ज्ञान नहीं आवे, ताँते गुरु चरणन में जावे।
गुप्त रहस्य गुरु सब जाने, जीव ब्रह्म के भेद पछाने।।
गुरु से प्राप्त करे विज्ञाना, मन के संशय सभी मिटाना।
ऐसे जन का त्यागे संगा, जासे चित्त वृत्ति हो भंगा।।
अविद्यायामन्तरे वर्त्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितम्मन्यमानाः।
जघङन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः।।1।।
अविद्यायां बहुधा वर्त्तमाना वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बालाः।
यत्कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात्तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते।।2।।
– मुण्ड0 खण्ड 2 । मं0 8-9।।
जिन्हें अविद्या धेर रही है, जन्म चक्र में फेर रही है।
अज्ञानी पूरे अभिमानी, बने हुए पुन पंडित मानी।।
फँसे चले माया के फंदे, जिमि अन्धों के पीछे अन्धे।
वे नर घोर नरक में जायें, लाख जतन कर उभर ना पायें।।
बाल बुद्धि कोरे अज्ञानी, कृत्यकृत्य अपने कहँ मानी।
केवल कर्म काण्ड अनुरागी, प्रभु दर्शन व०िचत दुर्भागी।
आवागमन चक्र में बंधे, महाँ कष्ट भोगेंगे अंधे।
इनकी संगति अति दुखदायी, कर्म गर्त में देत गिराई।
वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थांः, संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसतवाः।
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले, परामृतात् परिमुच्यन्ति सर्वे।।
– मुण्ड0 3 खण्ड 2 । मं0 6।।
वेद मंत्र ईश्वर प्रतिपादक, अर्थ सहित चित के आल्हादक।
जो संन्यासी उनके ज्ञाता, तद अनुसार अचार विधाता।
अन्तःकरण भये अति पावन, मुक्ति गंगा में करते प्लावन।
उन्हें मोक्ष सुख की उपलब्धि, जब लग पूरी होय न अवधि।
अवधि घटे पुन जग में आवें, बिन मुक्ति दुख नहीं नशावें।
न वे सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्त्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः।। – छान्दो0 प्र0 8 खं0 12
जब लग लगी संग यह देही, यह देही सुख दुख की गेही।
देह त्याग यह आम केवल, ब्रह्मानन्द भजे निर्केवल।
संसारी सुख दुख नहीं व्यापहिं, मुक्त जीव मुक्ति सुख प्रापहिं।
लोकैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च पुत्रैषणायाश्चोत्थायाथ भैक्षचर्यं चरन्ति।।
– शत0 कां0 14 । प्र0 5 व्रा0 2 कं0 1
जग का यश सुत धन की इच्छा, इन्हें त्याग मांगे जो भिच्छा।
रहे मुक्ति साधन लवलीना, संन्यासी भक्ति रस भीना।
प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं तस्यां सर्ववेदसं हुत्वा ब्राह्मणः प्रव्रजेत्।।1।।
– यजुर्वेदब्राह्मणे।।
प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेदसदक्षिणाम्।
आत्मन्यग्नीन्समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात्।।2।।
यो दत्त्वा सर्वंभूतेभ्यः प्रव्रजत्यभयं गृहात्।
तस्य तेजोमया लोका भवन्ति ब्रह्मवादिनः।।3।।
– मनु0 6 । 38-39
यज्ञ रचे प्रभु दश्रन कारण, शिखा सूत्र तहँ करे निवारण।
प०च अग्नि प्राणों में धारे, गृह के बंधन तोड़ बिसारे।
पार ब्रह्म वित गृह से निकसे, ताकी आतम ज्योति विकसे।
प्रश्न (दोहा)
संन्यासी का जगत में, सब जग करते मान।
क्या लक्षण संन्यास के, कहिये नृपा निधान।।
उत्तर
मनुष मात्र का धर्म समाना, एकहि धर्म धर्म नहीं माना।
बिन पखपात न्याय आचरणा, सदा सत्य पथ पर पग धरणा।
वेद विहित प्रभु आज्ञा पालन, मन से पाप पंक प्रक्षालन।
यह सब तन के धर्म साधारण, धर्म करे सब दुःख निवारण।
संन्यासी के धर्म विशेखा, पूजनीय यह भगवा भेखा।
दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
सत्यपूतां वदेद्वाचं मनःपूतं समाचरेत् ।।1।।
क्रूद्धयन्तं न प्रतिक्रुध्येदाक्रुष्टः कुशलं वदेत्।
सप्तद्वारावकीर्णां च न वाचमनृतां वदेत् ।।2।।
अध्यात्मरतिरासीना निरपेक्षो निरामिषः।
आत्मनैव सहायेन सुखार्थी विचरेदिह ।।3।।
क्लृप्तकेशनखश्मश्रुः पात्री दण्डी कुसुम्भवान्।
विचरेन्नियतो नित्यं सर्वभूतान्यपीडयन् ।।4।।
इन्द्रियाणां निरोधेन रागद्वेषक्षयेण च।
अहिंसया च भूतानाममृतत्वाय कल्पते ।।5।।
दूषितोऽपि चरेद्धर्मं यत्र तत्राश्रमे रतः।
समः सर्वेषु भूतेषु न लिगङं धर्मकारणम्।।6।।
फलं कतकवृक्षस्य यद्यप्यम्बुप्रसादकम्।
न नामग्रहणादेव तस्य वारि प्रसीदति ।।7।।
प्राणायामा ब्राह्यणस्य त्रयोऽपि विधिवत्कृताः।
व्याहृ तिक्रणवैर्युक्ता विज्ञेयं परमं तपः ।।8।।
दह्यन्ते घ्यायमानानां धातूनां हि यथा मलाः।
तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात् ।।9।।
प्राणायामैर्दहेद्दोषान् धारणाभिश्च किल्बिषम्।
प्रत्याहारेण संसर्गान् ध्यानेनानीश्वरान् गुणान् ।।10।।
उच्चावचेषु भूतेषु दुर्ज्ञेयामकृतात्मभिः।
प्रयानयोगेन संपश्येद् गतिमस्यान्तरात्मनः ।।11।।
लअहिंसयेन्प्रियासगङैर्वैदिकैश्चैव कर्म्मभिः।
तपसश्चरणैश्चोग्रैस्साधयन्तीह तत्पदम् ।।12।।
यदा भावेन भवति सर्वभावेषु निःस्पृह।
तदा सुखमवाप्रोति प्रेत्य चेह च शाश्वतम् ।।13।।
चतुर्भिरपि चैवैतैर्नित्यमाश्रमिभिर्द्विजैः।
दशलक्षणको धर्मः सेवितव्यः प्रयत्नतः ।।14।।
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धम्रलक्षणम् ।।15।।
अनेन विधिना सर्वांस्त्यक्त्वा सगङा०छनैः शनैः।
सर्वद्वन्द्वविनिर्मुक्तो ब्रह्मण्येवावतिष्ठते ।।16।।
– मनु0 अं0 6 । 46, 48, 49, 52, 60, 66, 67, 70-73, 75, 80, 91, 92
निम्र नयन हो मग पग धारे, अगर बगर नहीं आँख उघारे।
संन्यासी दृष्टि हो निर्मल, कबहुं न आये मन में कश्मल।
वस्त्र छान जल पिये पुनीता, निर्मल नीर अणु सों रीता।
मन में पहले बात विचारे, अनृत तज सूनृत को धारे।
क्रोध करे जब उस पर कोई, वह पुन स्वयं क्रुद्ध नहीं होई।
करता चले सत्य उपदेशा, देता रहे धरम संदेशा।
एक विवर मुख अरु दोऊ नासा, कर्ण छिद्र जँह शब्द निवासा।
दोऊ छिद्र राखें दोऊ नैना, इन छिद्रन मँह बिखरे बैना।
ताँते मिथ्या वचन न बोले, झूँटे नर का आतम डोले।
आतम ईश्वर में थिर होकर, मन के सकल मलों को धोकर।
निरअपेक्ष्य हो जग में डोले, सुख सों विचरे हृत्पट खोले।
मदिरा मांस कबहुं नहीं सेवे, भिक्षा माँग पेट भर लेवे।
आत्म सहायी हो सुख पावे, जग में विद्या धर्म बढ़ावे।
डाढ़ी मूछ केश मुंडवा कर, दण्ड पात्र धारे करुणाकर।
चोला रंग कुसुम्भी रंगे, भक्ति रंग में जगत सुरंगे।
दुनियां माँहि चरे संन्यासी, जीवन मृत्यु चक्र विनासी।
जग सों राग द्वेष सब छोड़े, इन्द्रिय जित प्रभु में मन जोड़े।
प्राणि मात्र सों तज दे वैरा, जो चाहत भव सागर तैरा।
मुक्ति हेतु बढ़ावे शक्ति, करता रहे प्रभु की भक्ति।
कोऊ निंदा कोउ करे प्रंशसा, संन्यासी निर्मल जिमि हंसा।
न्याय करे संन्यास प्रवीरा, जैसे हंस दुग्ध सों नीरा।
धर्म करे अरु धर्म प्रचारे, जगत खड़ा है धर्म सहारे।
निश्चित समझ रखे मनमाँहीं, भगवा चिह्न धर्म को नाँहीं।
हाथ कमंडल मोटा डंडा, धर्म बिना केवल पाखंडा।
प्राणिन को कर विद्या दाता, झूँठ निवार सत्य पर लाना।
यह संन्यासी के हैं लक्षण, जानहिं पंडित वर्ग विलक्षण।
जल सोधे निर्मलिया को फल, वरु बिन फल जल होय न निर्मल।
कतक कतक तुम नाम उचारो, जल में कतक तनिक मत डारो।
ताँते कर्म करें संन्यासी, प्रभु वेत्ता विद्या के रासी।
प्राणायाम करे मन मग्नी, सप्त व्याहृति सहित सलनगी।
अधिक करे अधिकहु फल पावे, तीन बार से नहीं घटावे।
जैसे धातु अगन तपाएं, सबरे मल तिनके जल जाएं।
ज्यों ज्यों तप्त होंय त्यों चमकें, निर्मल झमकें दीपित दमकें।
प्राणायाम तथा फल दाई, मन के मल सब देत जलाई।
मन इन्द्रिय अरु आत्म प्रलेपा, भस्म करे मन हो निर्लेपा।
प्राणायाम करे तिन छारा, संग दोष को प्रत्याहारा।।
ध्यान योग मँह चित्त रमाएं, हर्ष शोक आदिक जर जाएं।
अणु अणु में है ब्रह्म पसारा, सब के अंदर सब से न्यारा।।
जिमि सरीर में राजे आतम, अन्तर्यामी अरु परमातम।
उसकी पुन कोऊ गति न जानें, दुर्गम अगम अगोचर मानें।।
दुर्गम की गति देखा चाहो, ध्यान योग अभ्यास लगाओ।
ध्यान योग इक अद्भुत साधन, आतम दृष्टि करे प्रसादन।।
जीव जन्तु सों वैर न राखे, मधुर वचन संन्यासी भाखे।
विषय व्यसन इन्द्रिय के त्यागे, जग सोता संन्यासी जागे।।
निरत रहे अति उग्र तपस्या, जाते सुलझे मोक्ष समस्या।
इन कर्मन समरथ संन्यासी, काट सके वह यम की फासी।।
इच्छा रहित स्पृहा सों हीना, जब होवे आतम स्वाधीना।
बाहर भीतर सब व्यौहारा, संन्यासी पावन मति वारा।।
जीवन मुक्त होय सुख पाए, बहुर न भव बंधन में आए।
ताँते सब आश्रम सब वर्णी, रखें वृत्ति वेदों में वर्णी।।
दश लक्षण युत धर्म कमाएं, चार पदारथ सहजहिं पाएं।
पहिला लक्षण धीरज धरिये, मृत्यु आय तौ भी नहीं डरिये।।
हानि लाभ अथ निन्दा चर्चा, संन्यासी सब सहै सुवर्चा।
मन का दमन करे निष्पापा, मन में उठे न दुर्भग पापा।।
चौर कर्म की त्यागे वृत्ति, पर धन में नहीं करे प्रवृत्ति।
बिन पूछे पर वस्तु छूए, सो नर गिरे नरक के कूए।।
छल सों बल सों दे विसवासा, धन अपहरण करन की आसा।
जो यह त्यागे चौर प्रवृत्ति, सुख पाए दुख होय निवृत्ति।।
याको त्याग नाम सहुकारी, सहुकार साँचा व्यौहारी।
तन मन पावन शौच कहावे, तन सोधे जब सलिल नहावे।।
रोग द्वेष मन के मल प्यारे, सत द्वारा मन मैल निवारे।
इन्द्रिय निग्रह पुन बड़ धर्मा, दुष्कृत छाँड़ करे सत्कर्मा।।
सप्तम धर्म बुद्धि को शोधन, निर्मल मति अति हर्ष प्रबोधन।
मादक द्रव्य कबहुं नहीं सेवे, मादकता बुद्धि हर लेवे।।
दुष्ट संग आलस्य प्रमादा, मति नाशक बिरथा बकवादा।
भोजन शुद्ध करे सत्संगा, जासों निर्मल हो मति गंगा।।
जपी तपी हो योगाभ्यासी, पाये प्रभु घट घट को वासी।
विद्या धर्म जान सर्वोत्तम, विद्या धन सब धन परमोत्तम।।
पृथिवी से ईश्वर पर्य्यन्ता, जगत माँहिं हें द्रव्य अनन्ता।
उनका करे यथावत ज्ञाना, पुन गुन अवगुन जाने नाना।।
उचित लेय उनसे उपकारा, विद्या सब सुःखों को द्वारा।
मन वच कर्मणि एक सुविद्या, इनसे है विपरीत अविद्या।।
नवम ‘सत्य’ मन में सब धारें, सत्य कहें सत करें विचारें।
जो मन में सो बोले बानी, वही करे सो सत्य निशानी।।
मन औरे मुख औरहु बोले, चित के कपट कपाट न खोले।
दुष्ट नीच झूँठा बकवासी, झूँठ करे सब सत्यानासी।।
दशमो धर्म क्रोध नहीं करिये, शान्त भावना मन में धरिये।
चारहु वण्र धम्र पथ सेवें, जीवित चार पदारथ लेवें।
संन्यासी दश धर्म निभावे, धर्म मार्ग पर जगत चलावे।
संग दोष संन्यासी त्यागे, ब्रह्मानन्द मांहि अनुरागे।।
ब्रह्म माँहि थिति होवे वाकी, मोह ममता मिट जाये ताकी।
बनी गृही होवे ब्रह्मचारी, कोऊ वर्ण कोउ आश्रम धारी।।
संन्यासी उपदेश सुनावे, सब को सन्मारग पर लावे।
पाप पन्थ से जगत बचावे, संशय छेदे भरम मिटावे।।
प्रश्न
चार वर्ण में विप्र ही, केवल ले संन्यास।
अािवा सब संन्यास लें, त्याग भोग की आस।।
उत्तर
केवल ब्राह्मण लें संन्यासा, शेष वर्ण अस करे न आसा।
जन्म जात नहीं ब्राह्मण प्यारे, वे ब्राह्मण जो जगत सुधारें।।
ब्राह्मण वह जिस ब्रह्म पछाना, चतुर्वेद पाठी विद्वाना।
जो विद्या नहीं जाने पूरी, जाकी शिक्षा रही अधूरी।।
मन में नहीं पूरन वैरागा, धर्म भाव भल विधि नहीं जागा।
ग्रहण करे यदि वह संन्यासा, नहीं लाभ की उससे आसा।।
एष वोऽभिहितो धर्मो ब्राह्मणस्य चतुर्विधः।
पुण्योऽक्षयफलः प्रेत्य राजधर्मं निबोधत।।
– मनु0 6 । 97
दोहा
ब्रह्यचर्य्य गार्हस्थ्य पुन वानप्रस्थ संन्यास।
चतुराश्रम धारण करे विप्र पुण्य की रास।।
आश्रम धर्म मुक्ति का दाता, जीवन में है पुण्य विधाता।
राज धर्म सुनियो धर ध्याना, मुनि सन बोले मनु भगवाना।।
या ते सिद्ध भया यह प्यारे, यह संन्यास विप्र ही धारे।
ब्रह्मचर्य्य क्षत्रियगण पालें, समरथ भर सब धर्म बढ़ा लें।।
प्रश्न
क्या आवश्यकता है कहिये, क्यों संन्यासाश्रम को गहिये।
रहे कुटुम में मौज उड़ावे, द्वार द्वार क्यों ठोकर खावे।।
उत्तर
आवश्यक है जिमि शिर तन में, तिमि संन्यास चतुर्थे पन में।
ब्रह्मचर्य्य मँह विद्याभ्यासा, बाल्यकाल गुरुकुल मँह वासा।।
बचपन गया आई तरुणाई, ब्याह हुआ तरुणी घर आई।
कौन बात उसकी कोऊ बुझे, नून चून लकड़ी की सूजे।।
बानप्रस्थ बन में बनवासा, तपश्चरण जीवन की आसा।
नहीं अवकाश किसी को प्यारे, कोन जगत में धर्म प्रचारे।।
सोती दुनियां कौन जगावे, पल भर अवसर कोऊ न पावे।
संन्यासी बिन कौन उबारे, कौन चेतायें द्वारे द्वारे।।
बंधन मुक्त फिरें संन्यासी, कर्म काण्ड की टूटी फांसी।
वह सब का उसके हैं सारे, माया ग्रस्त लोक को तारे।।
ब्रह्मचर्य्य को करके पूरा, जो संन्यासी होवे शूरा।
वह जितनी कर सके भलाई, समराि नहीं अन्य की भाई।।
प्रश्न
जन संख्या उन्नति करे, प्रभु इच्छा अनुकूल।
गृह तज संन्यासी बने, प्रभु मन के प्रतिकूल।
चौपाई
जब गृहस्थ का होय विनासा, स्वयं नशहि आश्रम संन्यासा।
मनुषमात्र गृह तज बन जाए, नर का बीज नजर नहीं आए।।
उत्तर
जग में हैं लाखों नर ब्याहे, चले गए बिन सुत उपजाये।
संतति मरी रहा नहीं एका, वंश हीन नर मरे अनेका।।
क्या वह भी प्रभु के विपरीता, वंश हीन नर मरा न जीता।
यंत्र किया पर हुई न सिद्धि, यदि यह कहो लोक परसिद्धि।।
तो हम तुम से पूछें भाई, कृपा करो टुक देहु बताई।
जिस घर में हो बहु सन्ताना, करने लगें पाप यदि नाना।।
लड़ भिड़ कर हो जाँय नाशा, तो कितनी हानि की आशा।
संन्यासी उनको समझाएं, और परस्पर प्रेम सिखाएं।।
दें उपदेश नगर में जाकर, जनता लाभ उठावे पाकर।
लाखों नर इह भाँति बचाएं, नहीं तो लड़ भिड़ कर मर जाएं।।
नर भी सब नहीं हों संन्यासी, सब की कटे न ममता फांसी।
जिनके सुन साधुन उपदेशा, छूटे विषय भोग के क्लेशा;
उनको भी जानें संन्यासी, बिन भगवे वे पुण्य की रासी।।
प्रश्न
संन्यासी यह दें उपदेशा, हम को काम काज नहीं लेशा।
खाना पीना सुख सों सोना, क्यों रोयें हम जग को रोना।।
जग झूँठा झूँठे संसारी, मथुरा तीन लोक से न्यारी।
स्वयं ब्रह्म हैं हम निर्लेपा, पाप पुण्य का लगे न लेपा;
तुम भी पारब्रह्म हो जाओ, झंझट छोड़ो मौज उड़ाओ।।
देह धर्म है सदी्र गर्मी, मन है सुःख दुःख का धर्मी।
धर्म प्राण का भूख पिपासा, मिथ्या जग की करो न आसा।
झूँटे जग के सब व्यवहारा, इनमें फँसते मूढ़ गँवारा।
पाप पुण्य के इन्द्रिय भागी, हम को इन का लेख न लागी।
जो बतलाए तुम ने लक्षण, वे तो इनसे बहुत विलक्षण।
इन को तुम को किस को माने, सत्य झूँठ हम क्या पहचाने।
उत्तर
क्या वे मानत नहीं सत्कर्मा, मनु भगवान कहें यह धर्मा।
स्वयं बखानें मनु भगवाना, संन्यासी को कर्म विधाना।
खान पान क्या कर्म नहीं है, कबहु किसी ने तजे कहीं हैं।
जो यह कर्म न छूटने पावें, सत्कर्मन सों क्यों सकुचावें।
तजें सुकर्म पाप के भागी, नरतनु पाकर मरें अभागी।
जब गृहस्थ से गहें अहारा, क्यों न करें पुन प्रत्युपकारा।
नीच कृतन्घ रु निपट भिखरी, केवल भगवे वस्त्र पुजारी।
नाम मात्र के वे संन्यासी, आलसि जड़ प्रमाद के रासी।
आंखें व्यर्थ निरर्थक काना, दर्शन श्रवण काज नहीं लाना।
तिमि संन्यासी व्यर्थ पछज्ञनें, जो नहीं वेद रु शास्त्र बखानें।
पशु सम खान पान आहारा, जो नहीं करते धर्म प्रचारा।
भार रूप पृथिवी पर डोलें, ब्रह्म बने बकवादी बोलें।
जग को मिथ्या रूप बतावें, “पर हित में क्यों कष्ट उटावें”।
यह मिथ्या मूरत अति धूरत, भगवे चीर ठगों की सूरत।
सब कर्मन का आतम कर्ता, जो कर्ता है सोई भरता।
तन कर्मों की साधन वस्तु, क्यों अवस्तु को मानहिं वस्तु।
जीवहिं मानें ब्रह्म स्वरूपा, स्वयं अविद्या के हैं रूपा।
दोहा
सोते हैं अज्ञान की, निद्र में दिन रैन।
इधर उधर भटकत फिरें, नहीं ज्ञान के नैन।
चौपाई
अल्प जीव अरु है अल्पज्ञा, ब्रह्म महान पूर्ण सर्वज्ञा।
ब्रह्म नितय वह मरे न जनमें, भटकत फिरे जीव तन तन में।
शुद्ध बुद्ध प्रभु मुक्त स्वभावा, जीव मुक्त पुन बंधन पावा।
भरम अविद्या जीवहि व्यापे, पारब्रह्म को नहीं संतापे।
मरे न जनमें प्रभु अविनाशी, अन्तर्य्यामी घट घट वासी।
बँधा जीव माया की डोरी, नाच रहा कर गहे डँगोरी।
ताँते उनका कहना झूँठा, माँगत फिरत हाथ गह ठूठा।
प्रश्न
संन्यासी सब कर्म विनाशी, छुएं न करसों संपति राशी।
नहीं अग्नि को हाथ लगावें, भिक्षा माँगें पीवें खावें।
सत्य कथन उनका यह मानें, अथवा नख सिख झूँठा जानें?
उत्तर
संन्यासी के चिह्न बखानूं, जा को हौं संन्यासी मानूं।
संन्यासी प्रभु जानन हारा, दुष्ट कर्म से रहता न्यारा।
पुण्यवान जो करे सुकर्मा, त्याग दिये जिस सकल कुकर्मा।
निर्मल निर्मम निर अपराधु, वह साँचा संन्यासी साधु।
प्रश्न
कार्य्य गृहस्ािी का अध्यापन, पठन पाठ उपदेश अलापन।
लोगों को उपदेश सुनावें, पढ़े पढ़ावे ज्ञान बतावें।
संन्यासी क्यों समय गँवाये, प्रभु चरणन मँह ध्यान लगावे।
उत्तर
चारहु आश्रम दें उपदेशा, जाते मिटे विद्या क्लेशा।
एता समय कहां वरु पाएं, जो शिक्षा हित घर घर जायें।
संन्यासी को बहु अवकासा, सब की वही बुझाय पियासा।
ब्राह्मण पठन पाइ कर पावें, शिक्षा देवें ओर पढ़ावें।
नर को नर नारी को नारी, हैं अध्यापन के अधिकारी।
उनको भ्रमण समय नहीं एता, संन्यासी को मिलता जेता।।
ब्राह्मण वेद विरुध जब करते, नहीं अन्य वर्णों से डरते।
ब्राह्मण के सन्यस्थ नियन्ता, मत्त गजन तिमि अंकुश हंता;
ताँते समुचित है संन्यासा, है संन्यास पुण्य की आसा।।
प्रश्न (कुण्डलियां)
संन्यासी इक ठौर पर करे वास इक रात।
अन्य ग्राम जाकर बसें जब निकले परभात।।
जब निकले परभात उठावे दण्ड कमण्डल।
रहे अकेला सदा संग नहीं राखे मण्डल।।
जयगोपाल सम्हाल बितावे एक हि राता।
अधिक दिवस एकत्र रहे पुन बिगड़े बाता।।
उत्तर
किसी अंश में साँची बतियाँ, एक ठौर पर एक हि रतियां।
अधिक दिवस इक ठौर बितावे, पर उपकार करन नहीं पावे।।
अधिक संग से होय बुराई, राग द्वेष उपजे दुखदायी।
जो संन्यासी हो उपकारी, अवस रहे वह धर्म पुजारी।।
जैसे जनक नरेश दुआरे, पंच शिखादिक साधु सारे।
संन्यासी रहते थे बरसों, ज्ञान गोठ करते नृप वर सों।।
‘एकवास’ की कल्पित बाता, पाखण्डी इसके निर्माता।
मत पाखण्ड नहीं खुल जाये, ताँते जाल कुजाल रचाये।।
या शंका से लिखे शलोका, भेद न जान सके यह लोका।
प्रश्न
यतीनां का०चनं दद्यात्ताम्बूलं ब्रह्मचारिणाम्।
चौराणामभयं दद्यात्स नरो नरकं व्रजेत्।।
विविधानि च रत्नानि विविक्तेषूपपादयेत्।।
– मनु0 ।।
दोहा
स्वर्ण-दान दे यतिन को, ब्रह्मचारि को पान।
चोरों को निर्भय करे, सो नर नरकी जान।।
उत्तर
वर्णाश्रम अरु वेद विरोधी, स्वारथ मूरति सत्य विरोधी।
इस प्रकार के श्लोक बनावें, जग में निज परपंच रचावें।।
संन्यासी जब संपत पाएं, सत प्रचार में उसे लगाएं।
करिहैं वेद धर्म का मण्डन, पाखण्डों का होवे खण्डन।।
पुन नहीं भटकें द्वारे द्वारे, दीन रहें नहीं भोजन भारे।
पाखण्डिन को देते दाना, उसमें क्या होवे कल्याना;
संन्यासी करते उपकारा, उन ते होवे पुण्य प्रचारा।।
“विविधानि च रत्नानि विविक्तषूपपादयेत्।।”
संन्यासी को देवे दाना, हीरक रतन जवाहर नाना।।
प्रश्न
पढ़ने में पण्डित की भूला, इस विधि पाठ श्लोक है मूला।
दोहा
यति हस्ते सोना दिये, ब्रह्मचारि को पान।
चोरों को निर्भय करे, सो नर नरकी जान।।
उत्तर
यह कैसी है मूरखताई, रे भाई कँह बुद्धि गँवाई।
कर में देय नरक में जावे, पग पर धरे स्वर्ग पहुंचावे।।
यह सब इनकी झूठी बातें, भोलें मृग मारन की घातें।
थोरी सी इन में सच्चाई, है अवश्य जिहिं होय भलाई।।
उचित छोड़ अनुचित धन सेवे, वह रेते में नैय्या खेवे।
जगे रेन चोरों के डर से, निकस न जावे सोना कर से।।
मोह ममता तस करे निवासा, भजन भाव छूटे अभ्यासा।
होय जो वरु पूरन विद्वाना, जिसने मन में ब्रह्म पछाना।।
अनुचित नहीं करिहै व्यवहारा, मोह ममता से करे किनारा।
भोगे भोग बहुत तिस घर में, अब तृष्णा उसको नहीं भरमें;
ब्रह्मचर्य्य से हो संन्यासी, ममता माँहि न फँसे उदासी।।
प्रश्न
संन्यासी को श्राद्ध में, जो निज धाम जिमाय।
भाग जाँय उसके पितर, स्वयं नरक में जाय।।
उत्तर
मरे पितर कबहुं नहीं आवें, आवें नहीं लौट किम जावें?
पितृ लोक में किस पहुँचावे, स्वारथि अन्न पेट भर खावे।।
वेद विरुद्ध असम्भव आतें, केवल उदर पूर्ति की घातें।
दोहा
होत व्यवस्था प्रभु की, जीव कर्म अनुसार।
मर करके जीवन लहै, आवे पुन संसार।
को जन्मा किस योनि मांहीं, कहां बसे कोऊ जाने नाहीं।।
पुन पितरों का आना जाना, इधर खिलाना उत भिजवाना।
संन्यासी यदि घर में आयें, दम्भिन भेद सभी खुल जाएं।।
श्राद्ध जांय जायें पकवाना, कहां मिलें भोजन यह नाना।
मृतक श्राद्ध वेदों में नाहीं, निज स्वारथ दुष्टन वच मांही।।
(प्रश्न) कुण्डलिया
ब्रह्मचर्य्य पूरन किया, पुन लीना संन्यास।
बिन गृहस्थ अनुभव किये, कैसे होवे रास।।
कैसे होवे रास काम को वेग सताये।
घर घर डोलत फिरे देह पर भस्म रमाये।।
जयगोपाल सम्हाले कैसे चित्त दुरासा।
अवस पतित हो जाय कहां कित हो संन्यासा।
उत्तर
जो नर है इन्द्रिय को दासा, ताको उचित ने संन्यासा।
जो इन्द्रिय जित दृढ़ व्रतधारी, वीर धीर नैष्ठिक ब्रह्मचारी।।
तज संकोच होंय संन्यासी, तिनके मुक्ति चरण की दासी।
विषय दोष जिस नर ने जाने, वीर्य्य रत्न के गुण पहचाने।।
वह नहीं निकट भोग के जावे, प्रभु भक्ति में चित रमावे।
दोहा
ब्रह्मचारि निज वीर्य्य का, ईंधन लेत बनाय।
ज्वाला अग्नि विचार की, देता वीर्य्य जलाय।।
चौपाई
वैद्यरु औषध चाहे रोगी, औषध को नहीं चाहे निरोगी।
भोग रोग जिनको नहीं व्यापे, जाको विषय नहीं संतापे।।
जो नर नारी पर उपकारी, धर्म हेत रहते ब्रह्मचारी।
वे विवाह नहीं कभी करावें, संन्यासी की पदवी पायें।।
पंच शिखादिक नर ब्रह्मचारी, भई गारगी विदुषी नारी।
ऐसो जन लेवें संन्यासा, जीवन की हो पूरी आसा।।
जाको चित काँच सों काँचा, जग के राग रंग में रांचा।
वह संन्यास कबहुं जो धारे, स्वयं मरा औरों को मारे।।
दोहा
जिमि राजा को देश का, कहें लोग सम्राट्।
संन्यासी नृप ते बड़ा, ताको पद परिव्राट्।।1।।
राजा को आदर मिले अपने अपने देश।
सारा जग पूजा करे धन्य गेरुआ भेष।।2।।
विद्वर्त्त्व च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।।1।।
– चाणक्य नीति
विद्या शिक्षा अरु बल कारण, ब्रह्मचर्य्य को करते धारण।
गृह आश्रम कीजे सँगदारा, सीख जाय उत्तम व्यवहारा।
ज्ञान ध्यान तप चिन्तन हेतु, वानप्रस्थ तारन को सेतु।
दुष्टाचार विहार तियागा, संशय हरण सत्य अनुरागा।
इनके हेतु करे संन्यासा, अंत काल जीवन परकासा।
मुख्य धर्म जो करे न पूरे, वह संन्यासी रहे अधुरे।
उनका होय नरक में बासा, मिटे न उनको यम का त्रासा।
ताँते अन्यासिन कहँ योगू, मोह ममता के मेटहिं रोगू।
वेद शास्त्र सब पढ़ें पढ़ावें, सबके शंका भरम मिटावें।
करें वेद अरु शास्त्र प्रचारा, जाते उन्नत हो संसारा।
प्रश्न
अनिक भेख साधून के बैरागी गोसाइँ।
सन्यासिन के पंथ मँह उनको गनहिं कि नाहिं?।।
उत्तर
उन साधुन के भाव विलक्षण, सन्यासिन के एक न लक्षण।
तजा उन्होंने वैदिक मारग, गुरु माने विद्या को पारग।
वेद विरुध बोलहिं गुरबानी, सत्य धर्म की करते हानि।
मिथ्या ढोंग प्रपंच रचायों, स्वारथ हित निज पंथ फैलायें।
इन लोगों ने जग बहकाया, अन्ध कूप में देश गिराया।
दोहा
संन्यासाश्रम तो नहीं, स्वारथ आश्रम ठीक।
स्वारथ के सब पु०ज हैं, स्वारथ के परतीक।।
वैरागी गोसाईं उदासी, आदिक पंथ नहीं संन्यासी।
संन्यासी जन वे कहलाएं, धर्म करें जो धर्म फैलाएँ।
लोक और परलोक सुधारें, भवसागर से जग उबारें।

इति श्री आर्यमहाकवि जयगोपाल विरचिते सत्यार्थप्रकाश
कवितामृते प०चमः समुल्लासः सम्पूर्णः।।