01 सत्यार्थ प्रकाश कवितामृत भूमिका

सत्यार्थ प्रकाश कवितामृत
काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी
स्वर : ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर”
ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)

ओ3म्
श्रीयुत दयानन्दसरस्वतीस्वामिविरचितः

दयाया आनन्दो विलसति परस्स्वात्मविदितः,
सरस्वत्यस्यान्ते निवसति मुदा सत्यशरणा।
तदाख्यातिर्यस्य प्रकटितगुणा राष्ट्रिपरमा,
सकोदान्तः शान्तो विदितविदितो वेद्यविदितः।। 1 ।।

सत्यार्थप्रकाशाय ग्रन्थस्तेनैव निर्मितः।
वेदादिसत्यशास्त्राणां प्रमाणैर्गुणसंयुतः।। 2 ।।

विशेषभागीह वृणोति यो हितं,
प्रियोऽत्र विद्यां सुकरोति तात्त्विकीम्।
अशेषदुःखात्तु विमुच्य विद्यया,
स मोक्षमाप्रोति न कामकामुकः ।। 3 ।।

न ततः फलमस्ति हितं विदुषो,
ह्यदिकं परमं सुलभन्नु पदम्।
लभते सुयतो भवतीह सुखी,
कपटी सुसुखी भविता न सदा ।। 4 ।।

धर्मात्मा विजयी स शास्त्रशरणो विज्ञानविद्या वरोऽ-
धर्मेणैव हतो विकारसहितोऽधर्मस्सुदुःखप्रदः।
येनाऽसौ विधिवाक्यमानमननात् पाखण्डखण्डः कृत
सत्यं यो विदधाति शास्त्रविहितन्धन्योऽस्तुतादृग्घि सः।। 5।।

  1. सत्याश्रय सरस्वती (ज्ञान) जिसके अन्दर हृदय में प्रसन्नतापूर्वक वास करती है तथा जिसके नाम के अन्त में सरस्वती शब्द सुशोभित हो रहा है, ऐसे परमात्मा को स्व आत्मा में देखने (प्राप्त करने) वाले दया के आनन्द दयानन्द सरस्वती जब (इस भारतवर्ष में) वास करते थे, तब सदा प्रसन्न रहनेवाले, मन के स्वामी, इन्द्रियजयी, भूत-भविष्यत् के ज्ञाता की, उसके उदात्त चरित्र को प्रकट करनेवाली जाज्वल्या, अतिश्रेष्ठ ख्याति = कीर्ति सर्वत्र फैली हुई थी।। 1।।
  2. ऐसे विराट् व्यक्तित्व के द्वारा वेदादि सत्यशास्त्रों के प्रमाणों से युक्त सत्यार्थ के प्रकाश के लिए सत्यार्थ प्रकाश नामक ग्रन्थ का प्रणयन किया गया।। 2।।
  3. हितकारी परमात्मा का जो इस संसार में रहते वरण करता है, ऐसा विशेष प्रतिभा का धनी, परमात्मा का अत्यन्त प्रिय व्यक्ति ही तत्त्वज्ञान को सहजता से प्राप्त करता है तथा यथार्थज्ञान के द्वारा समस्त दुःखों से छूटकर नित्यानन्दस्वरूप मोक्ष को प्राप्त करता है, न कि कामनाओं (सांसारिक) के पीछे भागनेवाला..!! ।। 3।।
  4. मोक्ष से अधिक श्रेष्ठ हितकारी फल अन्य कोई नहीं है। सतत परम पुरुषार्थी व्यक्ति ही मोक्षपथ को सरलता से प्राप्त करके इस संसार में सुखी अर्थात् जीवनमुक्त हो जाता है। छली-कपटी कभी भी उत्तम सुख को प्राप्त नहीं कर सकता है।
  5. धर्मात्मा, कालजयी, शास्त्रैकशरण, ज्ञान-विज्ञान-पारग उस (दयानन्द) को छल-कपट से मार दिया गया। वस्तुतः सभी दुर्गुणों का आधार अधर्म अत्यन्त दुःखदायी है। जिसने शास्त्रों के प्रमाणों से पाखण्ड का खण्डन किया, तथा वेद-विहित सत्यों की स्थापना की, ऐसे हे दयानन्द तू धन्य है..!!!
  6. ये श्लोक सत्यार्थप्रकाश प्रथम संस्करण की मूलप्रति में विषयसूची के पश्चात् लिखे हुए हैं। महर्षि दयानन्द के ऋम्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय आदि ग्रन्थों में भी इसी प्रकार श्लोक लिखने की शैली मिलती है। ये श्लोक प्रथम और द्वितीय संस्करण में प्रकाशित होने से रह गये थे, इसीलिए यहां प्रकाशित किए जा रहे हैं। – सम्पादक
    आप्तोपदेश
    पूर्वेभिर्ऋषिभिरीड्याो नूतनैरुत (सं0)
    जो परमात्मा महापराक्रमयु७, सबका सुहृत्, अविरोधी है वह सुखकारक, वह सर्वोत्तम सुखस्वरूप, वह सुखप्रचारक, वह सकल ऐश्वर्यदायक, वह सबका अधिष्ठाता, विद्याप्रद और जो सबमें व्यापक पमेश्वर है, वह हमारा कल्याणकारक हो। जो सबके ऊपर विराजमान, सबसे बड़ा, अनन्तबलयु७ परमात्मा है उस ब्रह्म को हम नमस्कार करते हैं। हे परमेश्वर! आप ही अन्तर्योमिरूप से प्रत्यक्ष ब्रह्म हो। मैं आप ही को प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूँगा, क्योंकि आप सब जगह में होके सबको नित्य ही प्राप्त हैं। जो आपकी वेदस्थ यथार्थ आज्ञा है उसी को मैं सबके लिए उपदेश और आचरण भी करूँगा। सत्य बोलूँगा, सत्य मानूँगा और सत्य ही करूँगा, सो आप मेरी रक्षा कीजिए, जो आप मुझ आप्त सत्यव७ा की रक्षा कीजिए कि जिससे आपकी आज्ञा में मेरी बुद्धि स्थिर होकर विरुद्ध कभी न हो, क्योंकि जो आपकी आज्ञा है वही धर्म और जो उसके विरुद्ध वही अधर्म है। आप मेरी रक्षा करो, अर्थात् धर्म से सुनिश्चित प्रीति और अधर्म से घृणा सदा करूँ, ऐसी कृपा मुझ पर कीजिए, मैं आपका बड़ा उपकार मानूँगा।
    ओ3म् सच्चिदानन्देश्वराय नमो नमः
    सत्यार्थ प्रकाश भूमिका

दोहा
सत्य अर्थ प्रकाश हित, या सत्यार्थ प्रकाश।
जगे जोति नित सत्य की, झूठ तिमिर का नाश।।
चौपाई
सदा सत्य को सत्य बखाने,
अरु मिथ्या को मिथ्या माने।
सत्य अर्थ को यही प्रकाशा,
होय जगत में सत्य विकाशा।।
सत्य स्थान पर झूठ प्रकाशे,
वह नर झूठा सत्य प्रणाशे।
जो जैसा जग माँहि पदारथ,
वाको वैसा लिखे यथारथ।।
शुद्ध सत्य यह बात कहावे,
सत्य पुरुष का चरित बनावे।
अधम पुरुष जो है पखपाती,
सत्य बात नहीं उसे सुहाती।।
निज असत्य को सत कर माने,
पर का साँचहु झूठ प्रमाने।
वे नहीं सत्य प्राप्त कर पाते,
वे दुःख सागर गोते खाते।।

दोहा
सद्ग्रंथन निर्माण कर, अथवा दे उपदेश।
सुजन आप्त देते रहे, सदा सत्य सन्देश।।

चौपाई
सुन उपदेश झूठ जन त्यागे,
सुख स्वरूप सत्यहुं अनुरागे।
मानुष का आतम बहु ज्ञानी,
जान सके निज लाभ रु हानि।।
यह आतम बहु जाननहारा,
झूठ साँच कर सकता न्यारा।
तौ भी लख कर निज परयोजन,
धन संपति अरु वस्तर भोजन।।
झूठे मारग में झुक जाये,
करे दुराग्रह सुपथ न आये।
घोर अविद्या इस में कारण,
सत्य मार्ग से करे निवारण।।
शिव का जिसने सिमरन कीना,
मोक्ष धाम उसको प्रभु दीना।
नाम शतक हौं किया बखाना,
इन ते भिन्न नाम हैं नाना।
पारब्रह्म के नाम अनन्ता,
तुच्छ जीव पावे नहीं अन्ता।
गुण अनन्त कोउ अन्त न आवे,
कहा कीट सागर थाह पावे।
कर्म स्वभाव भाव हैं नाना,
हैं अनन्त नामी भगवाना।
वेद शास्त्र पढ़िये हो ज्ञाना,
नाम अनंत किये विख्याना।
जो वेदों के जानन हारे,
जानें वही पदारथ सारे।
प्रश्न
महाराज इक संशय भारी,
यह शंका मम करो निवारी।
ग्रन्थारम्भ आपने कीना,
प्रथम मंगलाचरण न दीना।
ग्रन्थकार हौं देखे जेते,
मंगलचार लिखें सब तेते।
ग्रन्थ आदि मध्य रु अवसाने,
सब मँह मंगलाचरण लखाने।

उत्तर
मङगलाचरणं शिष्टाचारात् फल दर्शनाच्छुतितश्चेति। सांख्य दर्शन। – अ0 5। सू0 1

सांख्य शास्त्र ने ऐसा गाया,
प्रथम सूत्र पंचम अध्याया।
उचित नहीं यह मंगलचारा,
भेड़ चाल सा यह व्यौहारा।
आदि मध्य अरु अन्त स्थाने,
मंगलचार उचित जो माने।
तो उनके जो मध्य ठिकाना,
उन महँ आदि मध्य अवसाना।
उन ठौरन मँह रहे अमंगल,
इन बातों से होय न मंगल।
सुनहु तात हौं तोहे समझाऊँ,
सांख्य शास्त्र का भाव बताऊँ।
सत्य न्याय अरु वेदनुकूला,
पक्षपात को कर निर्मूला।
प्रभु आज्ञा अनुकूलाचारा,
जो आचरहि सो मंगलचारा।
इस विध आदि अन्त परयन्ता,
लिखे ग्रन्थ साँचा श्री मन्ता।
ऐसा मंगलाचरण कहावे,
जो जन लिखे सो सिद्धि पावे।
तैत्तिरेय ऋषि की यह बानी,
क्या सुन्दर उपयुक्त बखानी।

“यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि” – तैत्तिरीयोपनिषत् प्र0 7 । अनु0 16

सुनहु कर्म जो धर्मनुसारा,
नित्य करहु उनका व्यवहारा।
वरु मैंने इस पुस्तक माँहीं,
रखी बात कोऊ ऐसी नाहीं।
इष्ट ना काहू को भरमाना,
नहीं काहू को चित्त दुखाना।।

कुण्डलिया
मनुष जाति की उन्नति, अरु होवे उपकार।
लिखने में इस ग्रन्थ के, यही भाव आधार।।
यही भाव आधार, सत्य को सब जन धारें।
निर्मल कर के चित्त, झूठ को मन से टारें।।
बिना सत्य उपदेश न होवे नरन समुन्नति।
केवल यही विचार मनुष जाति की उन्नति।।