१८- अधर्म-अंधकार

१८- अधर्म-अंधकार

धर्म गयो धरणी में आगयो अधर्मयुग।

पाप परितापन में भारत बेजार था।।

तांत्रिकों का तन्त्र-मन्त्र वाममार्ग का विहार।

पूर्ण पोपलीला का प्रसार पारावार था।।

दुष्ट को न दण्ड था उद्दण्ड को घमण्ड था।

प्रचण्ड खण्ड-खण्ड में पाखण्ड का प्रचार था।।

वैर था विकार था धिक्कार भरा भारत में।

खड़ा द्वार-द्वार अविद्या का अन्धकार था।।१८।।

~ दयानन्द बावनी
स्वर : ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर”
ध्वनि मुद्रण : कपिल गुप्ता, मुंबई