०७५ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (२६)

चतुर्थ समुल्लासःभाग (२६)

प्रश्न (गृहस्थाश्रम महिमा)

      गृह आश्रम सब सों बड़ा, अथ छोटा महाराज।

      चारहु आश्रम में बड़ा, हित कर कोन समाज ?

उत्तर (चौपाई)

      चारहुं आश्रम हैं अति ऊंचे, मुक्ति मार्ग के हेतु समूँचे।

      गृह आश्रम वरु परम पियारा, सब सृष्टि का एक सहारा।

      यथा नदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम्।

      तथैवाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम्।।१।।

                                    – मनु० ६ । ९०

      यथा वायुं समाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्वजन्तवः।

      तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्व आश्रमाः।।२।।

      यस्मात्त्रयोऽप्याश्रमिणो दानेनान्नेन चान्वहम्।

      गृहस्थेनैव धार्य्यन्ते तस्माज्जयेष्ठाश्रमो गृही।।३।।

      स संधार्य्यः प्रयत्येन स्वर्गमक्षयमिच्छता।

      सुखं चेहेच्छता नित्यं योऽधार्यो दुर्बलेन्द्रियैः।।४।।

                                    – मनु० ३ । ७७-७९

      अस्थिर नदियां नद परनारे, चलते रहते बिना सहारे।

      जब सागर का आश्रय पावें, अचल अडोल शान्त हो जाएं।

      सब का एक गृहस्थ सहारा, जिमि नदियों का उदधि अधारा।

      जो नहीं होवें लोग गृहस्थी, कँह से खायें बानपरस्थी।

      ब्रह्मचारी साधु संन्यासी, सब गृहस्थ के अन्न उपासी।

      सब के लिये गृही का द्वारा, गृही उठावे बोझा सारा।

      गृह आश्रम ताँते सर्वोत्तम, सब का प्राणाधार नरोत्तम।

      भुक्ति भुक्ति दोनों का दाता, सद्गृहस्थ जग में यश पाता।

      दुर्बल जन कर सके न धारण, करे गृहस्थी दुःख निवारण।

      जो गृहस्थ आश्रम नहीं होवे, संतति बीज कौन पुन बोवे।

      संन्यासी अरु बानपरस्थी, सब को उत्पन करे गृहस्थी।

      जो गृहस्थ की निन्दा करता, वह मूरख पच पच कर मरता।

      जो गृह आश्रम के गुण गाए, वह नर चार पदारथ पाए।

      नर नारी जँह राखें प्रीति, इक दूसर पर होय प्रतीति।

      हँस मुख निरत रहें पुरुषारथ, वे गृहस्थ सुख लहें यथारथ।

      यदि गृहस्थ सुख चाहो प्यारे, पहले ब्रह्मचर्य को धारे।

      पुनः स्वयंवर ब्याह कराए, जीवन भर आनन्द उठाए।

इति श्री आर्य महाकवि जयगोपाल विरचिते सत्यार्थप्रकाशकवितामृते चतुर्थंः समुल्लासः सम्पूर्णः।।४।।