०७२ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (२३)

चतुर्थ समुल्लासःभाग (२३)

कुह स्विद्दोषा कुह वस्तौरविश्ना कुहांभिपित्वं करतः कुहोषतुः।

      को वा शयुत्रा विधवैव देवरं मर्य्यं न योषा कृणुते सधस्थ आ।।१।।

                        – ऋ मं० १० । सू० ४० । मं० २।।

      उदीर्ष्व नार्यभि जीवलोकं गतासुमेतमुप शेष एहि।

      हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ।।२।।

                        – ऋ० मं० १० । सू० १८। मं० ८ ।।

      हे रमणी! नर पुंगव ! प्यारे, रैन दिवस तुम कहाँ गुजारे।

      संग संग पति पत्नी जैसे, विधवा संग देवर जिमि तैसे।

      कहाँ रहे कँह लिये पदारथ, कहाँ तुम्हारो वास यथारथ।

      कहाँ तुम्हारे शयनागारा, कोन देश को हो नर दारा।

      वेदों के यह मंत्र बताएं, नारी पुरुष एकट्ठे जाएं।

      जिमि पति पतनी सुत उपजायें, तिमि नियुक्ति भी वंश चलाएं।

प्रश्न

      जो न कोय लघु भ्राता कोउ, किससे करे नियोग।

      वंशोच्छेद न होय पुन, बिना किये संयोग।।

उत्तर

      देवरः कस्माद् द्वितीयो वर उच्यते।।  – निरु० अ० ३ खं० १५

      देवर के सँग वेद बखाने, देवर के तुम अर्थ न जाने।

      विधवा का द्वितीया भर्तारा, उसका देवर नाम पुकारा।

      ज्येष्ठ होय वा छोटा भ्राता, जासों होय नियोगी नाता।

      अपने से हो उत्तम वर्णी, अथवा होवे कोऊ सवर्णी।

      जासों नार नियोग करावे, वह उस का देवर कहलावे।

      अर्थ मंत्र दूसर को सुनिये, कर विचार मन अन्दर गुनिये।

      हे विधवे! तज मृत पति ध्याना, ढूसर सों करले सन्ताना।

      जो उससे तू सुत उपजाये, उस संतति को देवर पाये।

      जो तू निज हित करे नियोगू, तो संतति सुखकर उपभोगू।

      याही नियम नियोगी नर का, पालहि वचन सुवेद प्रवर का।

      अदेवृध्न्यपतिध्नीहैधि शिवा पशुभ्यः सुयमा सुवर्चां।

      प्रजावती वीरसूर्देवृकामा स्योनेममग्निं गार्हंपत्यं सपर्य।।

                        – अथर्व० । कां० १४। अनु० २ । मं० १८

      हे पति देवर की सुखदायिनि, गृह पशु हित कल्याण विधायिनि।

      नेम धर्म मँह चलने वारी, शील ज्ञान अरु रूप सँवारी।

      शूरवीर पुत्रों की माता, देवर अथ पति की सुख दाता।

      देवर अथवा पति को पाकर, गृह के सारे धर्म निभाकर।

      अग्नि होत्र सेवन नित करियो, निज गृहस्थ को सुख से भरियो।

      तामनेन विधानेन निजो विन्देत देवरः।।          – मनु० ९। ९६

      अक्षत योनि होवे विधवा, देवर व्याहि होय पुन सधवा।

प्रश्न

      कितनी संख्या में करें, यह नियोग नर नार।

      क्या क्या उनके नाम हों, जो नियुक्ति भर्तार।।

उत्तर

      सोमः प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविद उत्तरः।

      तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः।।

                        – ऋ० मं० १० । सू० ८५ । मं० ४०

      प्रथम विवाहित ‘सोम’ कहावे, दूसर को गंधर्व बतावें।

      तीसर पति को ‘अग्नि’ नामा, शेष सात मानुष अभिरामा।

      ग्यारह पति तक नार नियोग, इह विधि ग्यारह पुरुष सँभोगे।

प्रश्न

      दश बेटे ग्यारस पति, एकादश का भाव।

      सत्य अर्थ यूं मानिये, त्यागहु भाव कुभाव।।

उत्तर

      तुव कथन अनुसार यदि दश बेटे लें मान।

      उपर्युक्त कहँ जायेंगे वेद शास्त्र परमान।।

      देवराद्वा सपिण्डाद्वा स्त्रिया सम्यङ्नियुक्तया।

      प्रजेप्सिताधिगन्तव्या सन्तानस्य परिक्षये।। १ ।।

      ज्येष्ठो यवीयसो भार्य्यां यवीयान्वाग्रजस्त्रियम्।

      पतितौ भवतो गत्वा नियुक्तावप्यनापदि।। २।।

      औरसः क्षेत्रजश्चैव०               ।। ३।।

                              – मनु० ९ । ५९। ५८ । १५९

दोहा

      छः पीढ़ी भर्तार की, अथवा पति का भ्रात।

      विधवा उत्तम वर्ण मँह, ले नियोग कर तात।।

चौपाई

      यदि संतति की होय अनिच्छा, तो नियोग की करे न इच्छा।

      होने लगे वंश को नाशा, तो नियोग की समुचित आशा।

      जब नियोग से हो संताना, पुनः समागम पतन समाना।

      यदि दोनों सुत हेतु नियोगें, चौथे गर्भ तलक संयोगें।

      इह विधि होवें दश सन्ताना, अधिक करें सो लंपट जाना।

      पति पत्नी वा होंय नियोगी, दश सुत या मत होंय संयोगी।

      अधिक भोग लंपट को कर्मा, निन्दित व्यसनी पाप अधर्मा।

      संतति हेत विवाह नियोगा, काम केलि पशु गण को भोगा।

प्रश्न

      जबहुं नियोगे कामिनि, पुत्र हेतु कोऊ कन्त।

      जीते जी पति के करे, वा मरने उपरन्त।।

उत्तर

      अन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत्।।    – ऋ० । मं० १० । सू० १०।।

चौपाई

      पति संतति के होय अजोगू, समरथ हीन अशक्त संजोगू।

      स्वयं कहे वह निज नारी को, कल्याणी प्रिय भर्तारी को।।

      हे सुभगे ! सुन्दर! शुभ नारी, सन्तति योग नहीं मैं प्यारी।

      मुझ से अन्य देख नर कोई, जासों गर्भ सपूती होई।।

      तब नियोग कर ले वह नारी, पुत्रवती होवे भर्तारी।

      पर निज पति सेवा में लागी, रहे पति चरणन अनुरागी।।

      संतति योग न हो जब नारी, स्वयं कहे पति को सुविचारी।

      स्वामिन अब कोऊ विधवा गहिये, जाते पुत्र रत्न कोऊ लहिये।।

      पाण्डु नृपति की थीं दोऊ नारी, कुन्ती माद्री चतुर सयानी।

      कर नियोग बेटे उपजाये, कौरव पाण्डव जो कहलाये;

      चित्रवीर्य चित्राङग्द भ्राता, दोनों मरे तोड़ जग नाता।।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)