०७१ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (२२)

चतुर्थ समुल्लासःभाग (२२)

इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु।

      दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि।।

                        – ऋ० । मं० १० । सू० ८५ । मं० ४५।।

      इन्द्र! वीर्य्य के सिंचन हारे, पुरुष पराक्रम समरथ वारे।

      सुभग करहु तुम इन नारिन को, विधवाओं को पतिवारिन को।

      यह जो अहै विवाहित नारी, यह होवे दश पुत्री प्यारी।

      मान ग्यारवीं इसको रानी, अहो इन्द्र नर पुंगव मानी।

      हे नारी प्यारी भर्तारी, तु भी हो दश पुत्रों वारी।

      यह जो पुरुष विवाहित तेरा, पिता होय दश तंति केरा।

      पति नियुक्त सों ले सन्तान स से अपनी वंश चलाना।

दोहा

      दश सों अधिक न बाल हों, वेदाज्ञा अनुसार।

      अधिक शिशु उत्पन करे, तब जानहु व्यभिचार।।

चौपाई

      दश सों अधिक जो हों सन्ताना, दुर्बल होंय रोग को खाना।

      अल्पायु होवें नर नारी, दीन छीन अरु भ्रष्टाचारी।

      आयु बुढ़ापा दुःख उठाएं, बत्ती सम जल गल मर जायें।

प्रश्न

      पर पुरुषों को भोगे नारी, महाराज क्या बात विचारी।

      क्या यह नहीं है भ्रष्टाचारा, फैल जाय जग में व्यभिचारा।

उत्तर

      भोग करे बिन ब्याह के, जैसे भ्रष्टाचार।

      तैसे बिना नियोग के, भोग होय व्यभिचार।।

चौपाई

      नियम सहित ब्याहें नर नारीं, कौन कहे उनको व्यभिचारी।

      तिमि नियोग नेमहुँ अनुकूला, नहीं अपराध पाप को मूला।

      भिन्न वंश के बाला बालक, भिन्न कुटुम्ब और प्रतिपालक।

      नियम सहित जब ब्याह रचावें, बाजे गाजे ढोल बजावें।

      समय समागम देत बधाई, जात पातँ मँह बँटे मिठाई।

      उनको तनिक लाज नहीं आवे, पुन नियोग में क्यों शरमावे।

      जहाँ नियम तँह लाज न प्यारे, लाज उसे जो नियम बिगारे।

प्रश्न

      साँची बात आपकी मांनू, पर यह वेश्या वृत्ति जानूं।

      यह कुकर्म मन को नहीं भावे, ऐसा करते हृदय लजावे।

उत्तर

      कँह कंचनि के कुत्सित कर्मा, कँह नियोग वेदोचित धर्मा।

      वेश्या भोग करे जन जन से, उसे प्यार केवल पर धन से।

      उसका पुरुष न निश्चित कोई, जिसका पैसा उसकी सोई।

      कंचनि को नहीं सुत अभिलाखा, वंश हेत कोऊ पुरुष न राखा।

      नां वह विधवा नां वह व्याही, वह करती मन चीती चाही।

      नां कोई नियम नहीं प्रतिबंधा, केवल पर धन सों संबंधा।

      यह नियोग मँह नियम विशेषा, टूटे नहीं नियम की रेखा।

      जाको माने नियम समाजा, वहाँ कहां लज्जा को काजा।

      निज कन्या की भुज पकरावे, पुरुष पराया घर पर आवे।

      नेक न माता पिता लजावें, ब्याह समागम सभी करावें।

      तिमि नियोग में पाप न कोई, जो वर्जे पुन पापी सोई।

      स्वाभाविक नर नार सँयोगा, जो रोकहिं तो फैले भोगा।

      रोक सकहिं पूरन वैरागी, साँचे योगी साधु त्यागी।

      जब नियोग में पड़े रुकावट, छिप छिप होती मेल मिलावट।

      गर्भ पात से होंगे पातक, युवती युवक होंय शिशु घातक।

      इन पापन को पाप न मानो, बरु नियोग को पातक जानो।

      रोका चाहो जो व्यभिचारा, तो नियोग उत्तम व्यवहारा।

      मन इन्द्रिय जिन वश कर लीना, वे नियोग नहीं करें प्रवीना।

      इन्द्रिय जित जो नहीं नर नारी, यह नियोग उनको हितकारी।

      नहीं नियोग आवश्यक कर्मा, यह तो आपत्कालिक धर्मा।

      नीच वरन से उत्तम नारी, वेश्यागमन कर्म व्यभिचारी।

      गर्भ पात आदिक शिशुधाता, इन से ब्याह नियोग बचाता।

      ताँते समुचित कर्म नियोग, दूर होंय जाति के रोगा।

प्रश्न

      दयासिन्धु बतलाइये, क्या नियोग के नेम ?

      वंश बढ़े संतित फले, साँचा होवे प्रेम।।

उत्तर

      ब्याह नियोग को एक समाना, सब समाज देवे सन्माना।

      प्रकट होय जिमि ब्याह रचाएं, तिमि नियोग की ख्याति कराएं।

      जब नियोग निश्चित हो मन में, प्रकट करें परिवारिक जन में।

      कहें उन्हें हम करहिं नियोगा, पुत्र हेतु करिहैं संयोगा।

      जब अपनी हो आशा पूरी, पुन नहीं मिलें रहेंगे दूरी।

      एक मास में एक ही बारा, गर्भाधान करें संस्कारा।

      गर्भ रहे पर निकट न जाएं, एक वर्ष का नियम निभाएं।

प्रश्न

      क्या नियोग निज वर्ण में, करना उचित सुजोग।

      अन्य वर्ण में भी करे, अवसर पाय प्रयोग।।

उत्तर

      करे सवर्णी सों संयोगू, अथवा उत्तम वर्णं सुभोगू।

      वेश्या विप्र वैश्य अपनाये, क्षत्रिय सों वा सुत उपजाये।

      क्षत्रिय ब्राह्मण सों क्षत्रानी, केवल विप्र भजे विप्रानी।

      नीच वर्ण सों करे नियोगा, संतति उपजे नीच कुयोगा।

प्रश्न

      नर मन म उपजे भला, क्यों नियोग की चाह।

      एक नार की मृत्यु से, दूसर करे विवाह।।

उत्तर

      द्विज गण में नहीं पुनर्विवाहा, वेद शास्त्र हमने अवगाहा।

      चहें कुमार न विधवा नारी, विधुर न अबला चहे कँवारी।

      बिन नियोग नहीं अन्य उपाऊ, यह वृत्ति है सहज सुभाऊ।

      यथा ब्याह में वेद प्रमाना, तिमि नियोग मँह मंत्र समाना।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)