०७० स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (२१)

चतुर्थ समुल्लासःभाग (२१)

प्रश्न

      वंश नष्ट हो जायगा, रहे न कुल में कोय।

      जो नहीं पुनर्विवाहिये, कौन देयगा तोय।।

चौपाई

      ताँते समुचित पुनर्विवाहा, इस के बिना न होय निबाहा।

      विधवा विधुर होंय व्यभिचारी, धर्म भ्रष्ट होंगे नर नारी।

      गर्भ पात होने लग जावें, जो नहीं पुनर्विवाह करावें।

      बने जगत सब नरक नमूना, हो संसार धर्म से सूना।

उत्तर

      भ्रम में पड़े मित्र क्यों भूले, जग में चलो वेद अनुकूले।

      कोऊ उपद्रव का नहीं कारण, ब्रह्मचर्य जो कर लें धारण।

      जो चाहें वे वंश चलाना, कोउ बालक ले गोद बैठाना।

      दूर निकट का होवे बालक, उसे बनाए निज सुत पालक।

      वंश चले, नहीं हो व्यभिचारा, पुरुष होय हो चाहे दारा।

      ब्रह्मचर्य कर सकंहि न धारण, कर न सकें मन विषय निवारण।

      तिन कहँ समुचित करहिं नियोगा, सन्तति हेत क्षणिक संयोगा।

दोहा

      पुनर्विवाह नियोग में, पाँच बखाने भेद।

      जिन ते भ्रम संशय मिटें, दूर होंय सब खेद।

चौपाई

      ब्याह में कन्या पितु गृह त्यागे, टूट जायँ सम्बन्ध के तागे।

      पति गृह में जा करे निवासा, पूरन होंय पति सों आसा।

      वरु विधवा जब करे नियोगा, पूर्व पति घर होय संयोगा।

      पति नियुक्त के घर नहीं जावे, पति नियोगी तिय घर आवे।

      दुतिय भेद संतति को भारी, या को मन में लिहो बिचारी।

      पति नियुक्त से जो सन्तानें, होंय सो पूर्व पति की मानें।

      जाति गोत्र अरु संपति सारी, उसका गोत्रज हो अधिकारी।

      मृत पति के वे सुत कहलावें, उसका ही वे वंश चलावें।

      पूर्व पति के पुत्र अरु नारी, नहीं नियुक्त उनका अधिकारी।

      तीसर जो हो जुगल विवाहित, दोऊ परस्पर रहें समाहित।

      करें परस्पर सेवा पालन, रथ गृहस्थ का करते चालन।

      वरु नियुक्त टूटे सम्बन्धा, रहे न कोऊ पुन अनुबन्धा।

      चौथे ब्याह मरण पर्यन्ता, रहें परस्पर कामिनि कन्ता।

      यह नियोग का अन्तर भ्राता, कार्य होय पुन रहे न नाता।

      पंचम ब्याहे नर अरु नारी, एकहि गृह के दोऊ पुजारी।

      नर नारी जो होंय नियोगी, वे निज निज गृह के उपभोगी।

प्रश्न

      नियम नियोग ब्याह के कैसे, भिन्न भिन्न अथवा इक जैसे।

      कृपा करें कहिये विस्तारा, छूटे संशय भरम हमारा।

उत्तर

      कछु अन्तर ऊपर कहे, सुनहु शेष धर ध्यान।

      भरम भूत जाते मिटे, होय देश कल्यान।।

चौपाई

      ब्याहे सदा कुमार कुमारी, वे नियोग के नहीं अधिकारी।

      विधवा विधुर नियोग किरावें, कर नियोग संतति उपजावें।

      युगल विवाहित के सन्ताना, दश सों अधिक न शास्त्र विधाना।

      यह नियोग प्रतिबन्ध लगावे, सन्तति चार तलक उपजावे।

      यथा विवाहित नर अरु नारी, इक दूसर के हैं उपकारी।

      रहें इकट्ठे खाते पीते, संग रहें जब लग हैं जीते।

      यह व्यवहार न रखे नियोगी, वह केवल कुछ काल संयोगी।

      गर्भ हुए पर टूटे नाता, एक वर्ष लग मिलहिं न गाता।

      यदि निज हेत नियोगे नारी, तो मन राखे बात सम्हारी।

      करे नियोग पुरुष हित अपने, गर्भ अनन्तर लखहि न सपने।

      द्वयत्रय वर्ष शिशु को पाले, पुन बालक को पुरुष सम्हाले।

      चार शिशु विधवा उपजावे, दो को निज संतान बनावे।

      द्वै बालक पुन पाय नियोग, पुन न परस्पर होंय संजोगी।

      इस प्रकार इक विधवा दारा, स्वयं रखे दो शिशु अधारा।

      दो दो चार नरन कँह देवे, पुन नहीं कोऊ नियोगी सेवे।

      जिस नर की मर जाये नारी, कबहुं न ब्याहे नार कँवारी।

      विधवा के संग करे नियोगा, दो संतति हित करे सँभोगा।

      दश संतति तक वेद बखानें, वेद वचन शिर पर धर मानें।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)