०६९ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (२०)

चतुर्थ समुल्लासःभाग (२०)

शूद्र लक्षण

      शूद्र जीविका द्विज आधीना, सेवा करे परम परवीना।

      सुन्दर स्वादु पचे रसोई, जो जो खाय प्रशसें सोई। 

      उसके घर यदि होवे शादी, खान पान गृह वस्तर आदि।

      द्विज गण उनको देंय सहारा, जिससे उनका चले गुजारा।

      अथवा मासिक वेतन देवें, बदले में निज सेवा लेवें।

      चारहुं वर्णं रखें मिल प्रीति, यह सुन्दर जीवन की रीति।

      सम सुखदुःख लाभ अरु हानि, मिल जुल सबको आयु निभानी।

      राज्य प्रजा की चाहें वृद्धि, पुनः प्राप्त हो ऋद्धि सद्धि।

नारी दूषण

      पानं दुर्जनसंसर्गः पत्या च विरहोऽटनम्।

      स्वप्रोऽन्यगेहवासश्च नारीसन्दूषणानि षट्।। १।।

                                          – मनु० ९। १३

      पृथक रहे नर सों नहीं नारी, रहे तो जानहु पापिन भारी।

      नारी के छः दूषण भारे, इन ते नारी रहे किनारे।

      सुरा भंग आदिक मद पाना, दुर्जन संगति पीना खाना।

      जँह तँह डोलत फिरे अकेली, दरस परस साधुन की चेली।

      कहीं मन्दिर कहीं तीरथ जात्रा, मूरख निर्लज नार कुपात्रा।

      पर घर सोना और निवासा, सो नारी घर सत्यानासा।

      यही दोष पुरुषों के जानो, बुरा भला इनते पहिचानो।

दोहा

      जुगल जोड़ि नर नार की, मृत्यु करे विछोह।

      कै जावे परदेश में, जीवित छुटे न मोह।।

चौपाई

      जो परदेश कार्य को जावे, नारी को भी संग ले जावे।

      अधिक समय नर रहे अकेला, अवस होय व्यसनी अलबेला।

प्रश्न

      समाधान शंका करें, मोरी इक महाराज।

      बहु विवाह क्यों नहीं करे, इसमें कैसी लाज।।

उत्तर

      एक समय में एक ही, ब्याह करना है जोग।

      बहु विवाह समुचित नहीं, यह जाति को रोग।।

प्रश्न

      समयान्तर में होंय अनेका, इसमें कौन विचार विवेका।

      है इसमें कोउ शास्त्र प्रमाना, कृपया उत्तर दें भगवाना।

उत्तर

      या स्त्री त्वक्षतयोनिःस्वाद् गतप्रत्यागतापि वा।

      पोनर्भवेन भर्त्रा सा पुनः संस्कारमर्हति।। १ ।।

                                    – मनु० १ । १७६

      जा संग हुआ न नर संयोगा, अक्षत योनि भोग न भोगा।

      केवल भाँवर लीन बेचारी, वह नारी नहीं बाल कँवारी।

      अन्य पुरुष सों उसको ब्याहे, सुख सों आयु सकल निबाहे।

      नर भी अक्षत वीर्य विवाहें, यदि वे ब्याह कराना चाहें।

      द्विज गण हेतु नियम यह प्यारे, जाँते द्विज निज वंश सुधारे।

      क्षत वीरज क्षत योनि नारी, पुन विवाह के नहीं अधिकारी।

      कहा दोष हैं पुनर्विवाहे, सुनहु मीत यदि सुनना चाहे।

      नर नारी में रहे न प्रीति, पुनर्विवाह की हो यदि रीति।

      जब चो जो जिस को छोड़े, ऐ छोड़ दूसर में जोड़े।

      मृत स्वामी की लेकर संपत, अन्य पति संग नारी चंपत।

      पति कुटुम्ब तब करे लड़ाई, झगड़ों में सब धन लुट जाई।

      लाखों भद्र वंश मिट जाएं, लखपति घर घर मांगे खाएं।

      नारी व्रत और धर्म पतिव्रत, नष्ट होयगा पुण्य सतीव्रत।

      ताँते पुनर्विवाह नहीं करिये, जीये भले भले चहे मरिये।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)