०६७ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (१८)

चतुर्थ समुल्लासःभाग (१८)

अथ अध्यापक लक्षण

      आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता।

      यमर्था नायकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते।। १ ।।

      निषेवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते।

      अनास्तिकः श्रद्दधान एतत्पण्डितलक्षणम्।। २ ।।

      क्षिप्रं विजानाति चिरं शृणोति, विज्ञाय चार्थं भजते न कामात्।

      नासम्पृष्टो ह्युपयुङ्क्ते परार्थे, तत्प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य।। ३ ।।

      नाप्राप्यमभिवा९छन्ति नष्टं नेच्छन्ति शोचितुम्।

      आपत्सु च न मुह्यान्ति नराः पण्डितबुद्धयः।। ४।।

      प्रवृत्तवाक् चित्रकथ ऊहवान् प्रतिभानवान्।

      आशु ग्रन्थस्य वक्ता च यः स पण्डित उच्यते।। ५ ।।

      श्रुतं प्रज्ञज्ञनुगं यस्य प्रज्ञा चैव श्रुतानुगा।

      असंभिन्नार्यमर्यादः पण्डिताख्यां लभेत सः।।६।।

            – म० भारत। उद्योग पर्व विदुर प्रजागर अध्याय ३२

चौपाई

      आलस हीन रु आतम ज्ञानी, सदा कार्य्य रत तप को खानी।

      सुख दुख हानि लाभ समाना, स्तुति निन्दा अरु मान अमाना।

      हर्ष शोक सब सम कर जाने, वाको साँचा पण्डित माने।

      जिसे न सृष्अि पदार्थ लुभाएं, वे साँचे पण्डित कहलायें।

      श्रेष्ठ कर्म के जो अनुरागी, पाप मार्ग के जो जन त्यागी।

      आस्तिक ईश्वर के श्रद्धालु, वह पूरन पण्डित किरपालु।

      कठिन विषय लख पांय तुरंता, जिन को बात न कोउ दुरन्ता।

      बहु श्रुत अरु बहु शास्त्र विचारा, करें ज्ञान से पर उपकारा।

      बिन पूछे कोई बात न बोले, प्रथम बात का अवसर तोले।

      यह पंडित का पहला लक्षण, ऐसा पंडित होय विलक्षण।

      प्रापणीय जो नहीं पदारथ, जिसकी इच्छा निपट अकारथ।

      उस वस्तु को जो नहीं चाहे, नष्ट द्रव्य पर नहीं पछताये।

      विपति माँहि घबरावे नाँहीं, सो पंडित जानें मनमाहीं।

      वाक्पटु प्रश्नोत्तर कर्ता, चित्र कथन सों शंका हर्ता।

      अर्थ गहे अरु शीघ्र उचारे, सो पण्डित जो सत्य विचारे।

कुंडलिया

      जाकी बुद्धि अनुसरे, सत्य श्रवण अनुकूल।

      श्रवण न हो जा का कभी, निज प्रज्ञा प्रतिकूल।

      निज प्रज्ञा प्रतिकूल आर्य मरजाद न तोड़े।

      के ता संकट आय वेद मारग नहीं छोड़े।

      सो पंडित परमान मान अरु यश को मूला।

      जाकी बुद्धि चले सत्य श्रवणन अनुकूला।।

चौपाई

      जंह ऐसे पंडित अध्यापक, उसी देश की उन्न्ति व्यापक।

      जंह मूरख कोरे बकवादी, वंह जानो निश्चित बरबादी।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)