०६५ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (१६)

चतुर्थ समुल्लासःभाग (१६)

धर्मं शनैः सच्चिनुयाद् वल्मीकमिव पुत्तिकाः।

      परलोकसहायर्थं सर्वलोकान्यपीडयन्।। १ ।।

      नामुत्र हि सहायार्थं पिता माता च तिष्ठतः।

      न पुत्रदारं न ज्ञातिधर्मस्तिष्ठति केवलः।। २ ।।

      एकः प्रजायते जन्तुरेक एव प्रलीयते।

      एको नु भुड्क्ते सुकृतमेक एवच दुष्कृतम् ।। ३ ।।

                              – मनु. ४ । १३८ -२४०

      एकः पापानि कुरुते फलं भुड्क्ते महाजनः।

      भोक्तारो विप्रमुच्यन्ते कर्त्ता दोषेण लिप्यते।। ४ ।।

                  – म. भारत, उद्योग पर्व, प्रजागट पर्व अ. ३२

      मृत शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्ठसमं क्षितौ।

      विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति।। ५ ।।

                                          – मनु. ५ । २४१

      ताँते धर्म करहु नित प्यारे, धर्म लोक परलोक सुधारे।

      जिमि दीमक बल्मीक बनावे, शनै शनै तिमि धर्म कमावे।

      जीव जन्तु को दुख नहीं देवे, संग्रह सदा पुण्य कर लेवे।

      धर्म एक परलोक सहायी, वहाँ न माता पिता अरु भाई।

      बेटा बेटी बन्धु नारी, यह सब नाते हैं संसारी।

      आय अकेला जाय अकेला, दुनियां चार दिवस का मेला।

      पाप पुण्य का उत्तरदायी, तुही अकेला और न भाई।

      तु ही अकेला पाप कमावे, सब कुटुम्ब सुख भोगे खावे।

      पाप दण्ड तू सहे एकाकी, छूटें सभी कुटुम के बाकी।

कुण्डलियां

      इक दिन ऐसा आयगा, निकल जायँगे प्रान।

      बन्धु तुझे उठाय के, ले जायें शमशान।।

      ले जायें शमशन चिता पर डाल जलायें।

      तेरा तिनका तोड़ छोड़ सब घर को आयें।।

      ताँते जयगोपाल भजन कर ले भगवाना।।

      धर्म चलेगा संग निकल जायें जब प्राना।।

      तस्माद्धर्मं सहायार्थं नित्यं संचिनुयाच्छनैः।

      धर्म्मेण हि सहायेन तमस्तरति दुस्तरम्।।१।।

      धर्मप्रधानं पुरुषं तपसा हतकिल्विषम्।

      परलोकं नयत्याशु भास्वन्तं खशरीरिणम्।।२।।

                              – मनु. ४ । २४२ । २४३

चौपाई

      तांते धर्म करो नर स९िचत, जाते सुख से रहो न व९िचत।

      भावी जन्म मिले सुखकारी, धर्म होय तेरा सहकारी।

      दुस्तर अन्धकार अतिघोरा, धर्म सहायक केवल तोरा।

      तपसों जिसने पाप जलाये, किलविश सकल समूल नशाए।

      खम् ब्रह्म को पाये दर्शन, भासमन्त शुभ तेज प्रवर्षन।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)