०६४ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (१५)

चतुर्थ समुल्लासःभाग (१५)

ऋत्विक् पुरोहिताचाय्यैंर्मातुलातिथिसंश्रितैः।

      बालवृद्धातुरेवैंद्यैज्ञर्ज्ञतिसम्बन्धिबान्धवैः।। १ ।।

      मातापितृभ्यां यामिभिर्भ्रात्रा पुत्रेण भार्यया।

      दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत् ।। २ ।।

                                    मनु. ४ । १७९-१८०

      ऋत्विक यज्ञ कराने हारा, वंश पुरोहित सत्याचारा।

      गुरु मातुल अभ्यागत बालक, बूढ़े वृद्ध लोग प्रतिपालक।

      आश्रित रोगी वैद्य सवर्णी, धशुरादिक बान्धव हितचरणी।

      माता पिता भगिनी और भाई, इन सों करे न कबहुं लराई।

      इन से लड़े बहुत दुख पावे, मान प्रतिष्ठा सकल गँवावे।

      अतपास्त्वनधीयानः प्रतिग्रहरुचिर्द्धिजः।

      अभ्भस्यश्मप्लवेनैव सह तेनैव मज्जति।।

                                    – मनु. ४ । १९०

      त्रिष्वप्येतेषु दत्तं हि विधिनाप्यर्जितं धनम्।

      दातुर्भवत्यनर्थाय परत्रादातुरेव च।।         – मनु. ४ । १९३

      यथा प्लवेनौपलेन निमज्जत्युदके तरन्।   

      तथा निमज्जतोऽधस्तादज्ञौ दातृप्रतीच्छकौ।।

                                    – मनु. ४ । १९४

चौपाई

      ब्रह्मचर्य्य आदिक तपहीना, अनपढ़ दानाधीना दीना।

      यह तीनों डूबें मँझधारा, पाथर नाओ समुद्र अपारा।

      निज दाता को संग डुबावें, दुख सागर में गोते खावे।

      धर्मार्जित धन इनको देना, सम्पति देय विपत्ति लेना।

      इसी जन्म दुख पावे दाता, आगत जन्म गृहीता पाता।

      पाथर नौका चढ़ अज्ञानी, तरा चहें अंबुधि को पानी।

      डूबें लेने देने वाले, दुख सागर में वे मतवाले।

पाखण्डियो के लक्षण

      धर्मध्वजी सदालुब्धश्छाद्यिको लोकदम्भकः।

      वैडालव्रतिको ज्ञेयो हिंस्त्रः सर्वाभिसन्धकः।। १ ।।

      अधोदृष्टिर्नैष्कृतिकः स्वार्थसाधनतत्परः।

      शठो मिथ्याविनीतश्च बकव्रतचरो द्विजः।। २ ।।

                              – मनु. ४ । १९५ । १९६

चौपाई

      धर्म नाम ले ठगने हारे, लोभी कपटी छल को धारे।

      दम्भी अपनी करे बड़ाई, हिंसक सृष्टि को दुखदायी।

      जिनकी वृत्ति हो वैडाली, मुख मीठी और मन की काली।

      भले बुरे सबसों मिल वरतें, डरिये ऐसे धूरत नरते।

      नीची दृष्टि रखने वाले, निज नीति के हैं रखवाले।

      ईर्षालु प्राणों के घातक, पर जन नाशहिं गनहिं न पातक।

      दे विश्वास स्वार्थ हित मारे, स्वारथि सों नित करे किनारे।

      शठ निज हठ जो कबहुं न छोड़े, सत्पथ में अटकाये रोड़े।

      झूठमूठ की विनय दिखावे, हँस बोले अरु हाथ मिलावे।

      मिथ्या विनयी बड़े भयानक, पाथर निर्मित नकली मानक।

      बगुला भक्त साधु को भेखा, तँह शिकार मारा जँह देखा।

      एतेजन जानहु पाखण्डी, नीच दुष्ट दुर्जन उद्दण्डी।

      जो चाहो जीवन की आसा, इन पर करहु नहीं विस्वासा।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)