०६३ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (१४)

चतुर्थ समुल्लासःभाग (१४)

प९चमहायज्ञों का फल

      पंच यज्ञ को बड़ी महातम, हों प्रसन्न आतप परमातम।

      ब्रह्मयज्ञ सों विद्या उन्नति, धर्म सभ्यता गुणन समुन्नति।

      अग्गिहोत्र से हो जग पावन, नष्ट होय दुर्गन्धि अपावन।

      शुद्ध होय जल वायु वृष्अि, सुखद स्वास्थ्य पावे सब सृष्टि।

      शुद्ध पवन में ले नर श्वासा, अग्नि होत्र सों उठे सुवासा।

      बुद्धि बढ़े तनु हो बलवाना, चार पदारथ मिलें समाना।

      दैव यज्ञ है या को नामा, परम पुनीत स्वर्ग को धामा।

      सेवहि मात पिता गुरु ज्ञानी, अरु पंडित विद्या के दानी।

      इनते बढ़े मनुज को ज्ञाना, साँच झूठ की हो पहिचाना।

      सत को गहे असत को त्यागे, अति सुख पाये सत अनुरागे।

      माता पिता परम उपकारी, जीवन भर रहिये आभारी।

      उनका बदला अवस चुकाना, कर नित सेवा सुख पहुंचाना।

      पितृ यज्ञ संज्ञा है याकी, करे जो जग में शोभा ताकी।

      बलीवैश्वदेव, नित करिये, जो चाहो भवसागर तरिये।

      जब लग उत्तम नहीं अभ्यागत, तब लग दूर न होंय दुरागत।

      इनके बिना न उन्नति होवे, पहुनाई सब अवगुण धोवे।

      देश विदेश करी उन यात्रा, उनसे बढ़े ज्ञाना की मात्रा।

      अनुभव से सन्मार्ग बतावे, झूठ साँच की जाँच करावे।

      उनसे हों सन्देह निवर्तन, सत्य धर्म का होय प्रपर्वन।

      ब्राह्मे मुहूर्त्ते बुध्येत धर्माथौं चानुचिन्तयेत्।

      कायक्लेशाँश्च तन्मूलान् वेदतत्त्वार्थमेव च।।

                                          मनु. ४ । १२

      ब्राह्म मुहूरत सब जन जागो, आलस छोड़ो शय्या त्यागो।

      धर्मं अर्थं का चिन्तन करिये, प्रभु का ध्यान हृदय में धरिये।

      तनु की व्याधि और निदाना, चिंतन कर मन में भगवाना।

      पापाचरण कबहुं नहीं करना, अन्तर्यामी प्रभु सों डरना।

      नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति गौरिव।

      शनैरावत्तमानस्तु कर्त्तुर्मूलानि कृन्तति।।

                                          – मनु. ४ । १७२

      अधर्मेणैधते तावत्ततो भद्राणि पश्यति।

      ततः सपता९जयति समूलं तु विनश्यति।।

                                          – मनु. ४ । १७४

      सत्यधर्मार्यवृत्तेषु शौचे चैवारमेत्सदा।

      शिष्याँश्च शिष्याद्धर्मेण वाग्बाहूदरसंयतः।।

                                          – मनु. ४ । १७५

      पापाचरण तुरत नहीं फलता, शनै शनै बत्ती सम जलता।

      समय पाप सर्वंस्व विनासे, ज्यों जल में गल जांय बतासे।

      पापी पाप करे और फूले, जिमि तरु फूले नदिया कूले।

      छीन झपट शत्रुन को जीते, दुर्बल रुधिर पान कर जीते।

      पुष्कल पाप नदी जब चढ़ती, तीछन धारा छिन छिन बढ़ती।

      तोड़ फोड़ सब देत करारे, जड़ सों उखड़े तरु किनारे।

      यही दशा पापी की होवे, पहले हंसे पाछे रोवे।

      भोले जन पर कर अन्याया, करे एकट्ठी घर में माया।

      खावे पीवे मौज उड़ावे, मान तान सुन्दर पहरावे।

      हुकम हुकूमत नौकर चाकर, ऐंठे अकड़े माया पाकर।

      पड़े समय की एक चपेटा, धन दौलत सब जाय लपेटा।

      पुन दाने दाने को तरसें, आंखों से जल धारा बरसें।

      क्या होवे पाछे पछताये, नहीं समझे पहले समझाये।

      ताँते आर्य वृत्त अपनाएं, धर्म कर्म में चित्त रमाएं।            

आर्य बनें दे सद उपदेशा, धर्म प्रचारें देश विदेशा।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)