०६१ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (१२)

चतुर्थ समुल्लासःभाग (१२)

पितृ तर्पण

      ओं सोमसदः पितरस्तृप्यन्ताम्। अग्निष्वात्ताः पितरस्तृप्यन्ताम्।

      बर्हिषदः पितरस्तृप्यन्ताम्। सोमपाः पितरस्तृप्यन्ताम्। हविर्भुजः

      पितरस्तृप्यन्ताम्। आज्यपाः पितरस्तृप्यन्ताम्। सुकालिनः

      पितरस्तृप्यन्ताम्। यमादिभ्यो नमः यमादींस्तर्पयामि। पित्रे स्वधा

      नमः पितरं तर्पयामि। पितामहाय स्वधा नमः पितामहं तर्पयामि।

      प्रपितामहाय स्वधा नमः प्रपितामहं तर्पयामि। मात्रे स्वधा नमो

      मातरं तर्पयामि। पितामह्यै स्वध नमः पितामहीं तर्पयामि।

      प्रपितामह्यै स्वधा नमः प्रपितामहीं तर्प्पयामि। स्वपत्न्यै स्वधा नमः

      स्वपत्नीं तर्पयामि। सम्बन्धिभ्यः स्वधा नमः सम्बन्धिनस्तर्पयामि।

      सगोत्रेभ्यः स्वधा नमः सगोत्राँस्तर्पयामि।।

इति पितृतर्पणम्।।

चौपाई

      जे पदार्थ विज्ञान प्रवीना, पारब्रह्मा मन में जिन चीना।

      तिनको नाम सोमसद भाई, तिनहि पितर की पदवी पाई।

      आगनेय हैं जिते पदारथ, जानहिं तिनके गुणहिं यथारथ।

      तिन कहँ अग्निष्वात पुकारें, वही देश की दशा सुधारें।

      जो जन सद्व्यवहारे चातर, बर्हीषद ते योग्य सुपातर।

      परधन संपति के रखवारे, सोम महौषध पीने हारे।

      स्वयं स्वस्थ पुन रोग मिटावें, व्याधि ग्रस्त को दवा पिलावें।

      सोमपा वे रोग निवारक, वही पितर वे स्वास्थ्य सुधारक।

      तज हिंसा जो करते भोजन, मद्य माँस नहीं छूएं जो जन।

      तिनका नाम हविर्भुज गावें, वे पितरन मँह आदर पावें।

      जानन जोग वस्तु के रक्षक, दूध दही घृत माखन भक्षक।

      ते आज्यप पितृ पद जोगू, बलकारी द्रव्यन उपभोगू।

      शुभ कर्मन मँह समय बितावें, ते सज्जन शोभन कहलावें।

      न्यायाधीश पितर यम नामी, दण्डहिं दुष्टन जगहित कामी।

      संतति की रखते रखवारी, अन्नादिक बहुविध सत्कारी।

      पालक पोषक जन्म के दाता, सब से ऊँचा प्रेम का नाता।

      पित्तर पिता का होवे दादा, दादा जनक जान परदादा।

दोहा

      पिता पितामह आदि की, सेवा धर्म महान।

      जो उनकी सेवा करे, पावे पद कल्यान।

चौपाई

      आदर मान करे सो माता, प्रेम मयी जीवन की दाता।

      पितु माता कहलाये दादी, वाकी माता है परदादी।

      पत्नी भगिनी गोत सम्बन्धी, भले बृद्ध, कुल के अनुबंधी।

      श्रद्धा सहित तिनहिं जो सेवे, अन्न वस्त्र आदर सों देवे।

      या को तर्पण श्राद्ध बखानें, मृतक श्राद्ध को शास्त्र न माने।

      चौथे वैश्वदेव नित कर्मा, परम पूनीत मनुज को धर्मा।

      होय सिद्ध जब पक कर भोजन, डाले नित्य आहूति जो जन।

      सो नर सदा स्वास्थ्य को पावे, रोग शोक कोउ निकट न आवे।

      घृत मिष्टान्न आदि की हूती, अग्नि माँहि आरोग्य प्रसूति।

      पृथक करे चूल्हे से आगी, आहुति देवे पुण्य को भागी।

      खारी लोनी और खटाई, वस्तु न डारे अग्गिहिं भाई।

      पढ़े मन्त्र यह देय आहूति, यश दायक बल बुद्धि विभूति।

      वैश्यदेवस्य सिद्धस्य गृह्येऽग्रौ विधिपूर्वकम्।

      आभ्यः कुय्याद्देवताभ्यो ब्राह्मणो होममन्वहम्।।

                                    – मनु. ३ । ८४

      ओं अगन्ये स्वाहा। सोमाय स्वाहा। अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा। विश्वेभ्यो

      देवभ्यः स्वाहा। धन्वन्तरये स्वाहा। कुह्वै स्वाहा। अनुमत्यै स्वाहा।

      प्रजापतये स्वाहा। सह द्यावापृथिवीभ्यां स्वाहा। स्विष्टकृते स्वाहा।।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)