०५९ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (१०)

चतुर्थ समुल्लासःभाग (१०)

सदा प्रहष्टया भाव्यं गृहकार्येषु दक्षया।

      सुसंस्कृतोपस्करया व्यये चामुह्महस्तया।।   – मनु० ५ । १५०

      नारी गृह के काज सम्हारे, हो प्रसन्न सब बात विचारे।

      गृह वस्तु सब सहज सजाये, जो देखे हर्षित हो जाये।

      सुखी रखे परिवारिक जन को, उचित रूप से खर्चे धन को।

      शुद्ध पवित्र बनाय रसोई, ताते रोग न होवे कोई।

      आय व्यय का व्योरा राखे, मिथ्या वचन कबहुं नहीं भाखे।

      भृत्यों से गृह काज करावे, कारज कोऊ बिगड़ नहीं पावे।

      स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या सत्यं शौचं सुभाषितम्।

      विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वतः।।

                                    – मनु० २ । १४०

      रत्न जवाहरनार सुहानी, सत्य शौच विद्या शुभ वानी।

      उत्तम शिल्प होंय जंह नाना, है कर्तव्य मनुष्य का पाना।

      देश विदेश जहां ते पावे, ऐसे रतन तुरत अपनावे।

      सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयातृ सत्यमप्रियम्।

      प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः ।। १ ।।

      भद्रं भद्रमिति ब्रूयाद्भद्रमित्येव वा वदेत्।

      शुष्कवैरं विवादं च न कुर्यात्केनचित्सह ।। २ ।।

                              – मनु० ४ । १३८-१३९

      सत्य कहे पर बोले प्यारा, ऐसा बोले वचन सम्हारा।

      कड़वा सत्य कबहुं मत बोलो, पहले तोलो पाछे बोलो।

      प्यारा हो पर होवे झूठा, ऐसा वचन न बोल अनूठा।

      सदा बोल वाणी हितकारी, सुखकारी अति प्यारी प्यारी।

      शुष्क वैर नहीं करे विवादा, मनर९जक कीजे संवादा।

      चाहे कोई बुरा मनावे, हितकर बतियां अवस सुनावे।

      पुरुषा बहवो राजन् सततं प्रियवादिनः।

      अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः।।

                              – उद्योग पर्व विदुरनीति ५ । १५

      अप्रिय पथ्य कहे जो राजन, दुर्लभ ऐसा प्यारा साजन।

      जगत करे सब ठकुर सुहाती, यह सृष्टि स्वारथ की साथी।

      सांचा मीत वही है प्यारा, सन्मुख कहने सुनने हारा।

      नयन ओट गुण वर्णनकारी, सो साँचा सज्जन हितकारी।

      जब लग नहीं निज दोष सुनावे, दोषों से किमि मुक्ति पावे।

      पर निन्दा भूलेहु नहीं करिये, निन्दक हो किस विध भवतरिये।

      गुण को दोष दोष गुण मानें, उस पापी को निंदक जानें।

      दोष दोष गुण गुण जो कहते, स्तुति कारक वे सुख से रहते।

      ताँते निंदक अनृतवादी, स्तुति जानहु सत भाषण आदि।

      बुद्धिवृद्धिकराण्याशु धन्यानि च हितानि च।

      नित्यं शास्त्राण्यवेक्षेत निगमांश्चैव वैदिकान्।। १ ।।

      यथा यथा हि पुरुषः शास्त्रं समधिगच्छति।

      तथा तथा विजानाति विज्ञानं चास्य रोचते।। २ ।।

                                    – मनु० ४ । १९-२०

      बुद्धि वर्धन संपतिकारी, शास्त्र सुनें नित नर अरु नारी।

      पूर्व पठित नित ग्रन्थ विचारे, बिन स्वाध्याय समय नहीं हारे।

      ज्यों ज्यों होय शास्त्र को ज्ञाना, बढ़त जात रुचि अरु विज्ञाना।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)