०५८ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (०९)

चतुर्थ समुल्लासःभाग (०९)

ऋतु कालाभिगामीस्यात्स्वदार निरतः सदा।

      पर्व वर्जं ब्रजेच्चैनां तदृव्रतो रतिकाम्यया।।

      निन्द्यास्त्रष्टासु चान्यासु स्त्रियो रात्रिषु वर्जयन्।

      ब्रह्मचार्येव भवति यत्र तत्रााश्रमेवसन्।।

                                          – मनु० ३ । ५०

      सन्तुष्टो भार्यया भर्त्ता भर्त्रा भार्या तथैव च।

      यस्मित्रेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम्।। १ ।।

      यदि हि स्त्री न रोचेत पुमांसन्न प्रमोदयेत्।

      अप्रमोदात्पुनः पुंसः प्रजनं न प्रवर्त्तते।। २ ।।

      स्त्रियां तु रोचमानायां सर्वं तद्रोचते कुलम्।

      तस्यां त्वरोचमानायां सर्वमेव न रोचते।। ३ ।।

                              – मनु० अ० ३ । ६०-६२

      वह गृहस्थ जानहु ब्रह्मचारी, जा को नारी अपनी प्यारी।

      जिन रात्रिन मँह वर्जित भोगा, करउ नहीं उन मँह संजोगा।

      ऋतुगामी निज मन का स्वामी, पर नारि चितवे नहीं कामी।

      नर में नारी नारी नर में, जहां प्रेम राखें तिस घर में।

      सदा रहे सुख संपति वासा, जहां कलह तहां होत विनासा।

      जाकी पति सों नाहीं प्रीति, वह पतनी नहीं पतित अनीति।

      पति की मरे कामना सारी, सुख सौभाग्यहीन वह नारी।

      बधु प्रसन्नता गृह सुखदायक, पत्नी रोष महाँ दुखदायक।

      पितृभिर्भ्रातृभिश्चैताः पतिभिर्देवरैस्तथा।

      पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः।। १ ।।

      यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।

      यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राऽफलाः क्रियाः।। २ ।।

      शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम्।

      न शोचन्ति तु यत्रैता वर्द्धते तद्धि सर्वदा।। ३ ।।

      तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनाशनैः।

      भूतिकामैर्नरैर्नित्यं सत्कारेषूत्सवेषु च।। ४ ।।

                              – मनु० ३ । ५५ । ५७ । ५९

      पितु भाई पति देवर सारे, सब जन नारी को सत्कारे।

      भूषण वस्त्र देय करि आदर, कबहुं न इसका करे निरादर।

      जो चाहो गृह में कल्याना, नारि महातम मनु बखाना।

      पूजित नारी जिस घर मांही, वहां नहीं दुख को परछांही।

      उस घर के गृह जन सब देवा, संपति करे चरण को सेवा।

      जो कुल नारिन को दुत्कारे, देव लोक वाको धिक्कारे।

      सभी क्रियाएं निष्फल जावें, काम करें पर फल नहीं पावें।

      नारिन के मुख जहाँ उदासी, सो कुल जानहु सत्यानासी।

      जँह प्रसन्न चित हर्षित वामा, वहां नचत लक्ष्मी अभिरामा।

      तांते जो सुख सम्पति चाहें, नारिन और सराहें।

      भूषण वस्तर दें उपहारा, करें नारि का नित सत्कारा।

      पूजा से आदर परयोजन, भूषण वत्र भेंट और भोजन।

      दिवस रात दोऊ काल नमस्ते, करहिं नमस्ते मृदु मुख हस्ते।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)