०५६ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (०७)

चतुर्थ समुल्लासःभाग (०७)

वैश्य के गुण कर्म

      पशूनां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च।

      वणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च।। १ ।।

                                    – मनु० १ । ९०

      गो आदिक पशुओं का वर्धन, धर्म वृद्धि हित वर्धन निज धन।

      अग्नि होत्र आदिक का करना, सत्संगति प्रभु नाम सिमरना।

      वेद पठन अरु वनज व्यापारा, करे व्याज का सद् व्यौहारा।

      चार आठ छः बारह आना, सौ पर मासिक सूद लगाना।

      बीस आना से अधिक जो पावे, वैश्य नहीं वह चोर कहावे।

      होवे व्याज मूल से दूना, इससे अधिक पाप है छूना।

      कृषि कर्म से उपज बढ़ावे, इन कर्मन ते वैश्य कहावे।

शूद्र के गुण कर्म

      एकमेव हि शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत्।

      एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया।।

                                    – मनु० १ । ९१

      निन्दा जरन और अभिमाना, तजे करे द्विज को सन्माना।

      तीन वर्ण की सेवा करना, उन सों करे उदर की भरना।

      केवल यही शूद्र को कर्मा, सर्व श्रेष्ठ सेवा को धर्मा।

      खुला रहे वर्णों का द्वारा, योग्य होंय पायें अधिकारा।

      एहि विधि भारत होवे ऊंचा, मल विकार मिट जाय समूचा।

      डरत रहें द्विज उत्तम वरणी, नभ ते गिरें न लोटें धरणीं।

      खड़े रहें निज कर्मन ऊपर, संकर वर्ण रहें नहीं भू पर।

      खुले शूद्र कंह उन्नति द्वारा, घर घर हो विद्या परचारा।

      बढ़े शूद्र के मन उत्साहा, उत्तम वर्ण प्राप्ति की चाहा।

      धर्म वृद्धि विद्वा परचारा, ब्राह्मण को यह दें अधिकारा।

      वे धर्मी पूरन विद्वाना, वे समर्थ वे योग्य सुजाना।

      राज्य संभारे क्षत्रिय मानी, विघ्र न होय होय नहीं हानि।

      पशु पालन अरु धन व्यापारी, केवल वैश्य रहें अधिकारी।

      शूद्र निरक्षर मूरख सारे, नहीं जानें विज्ञान बेचारे।

      करते केवल तनु के कर्मा, केवल सेवा उनको धर्मा।            

सभ्य लोग राजा महाराजा, वर्ण प्रबर्तन उन को काजा।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)