०५४ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (०५)

चतुर्थ समुल्लासःभाग (०५)

शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्।

      क्षत्रियाज्जातमेवन्तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च।।

                                    – मनु० १० । ६५

      शूद्र कुलन मँह होवे उत्पन्न, ब्राह्म कर्म ते होवे ब्राह्मन।

      क्षात्र कर्म सों क्षत्रिय होवे, क्षत्रिय बनें शूद्रपन खोवे।

      वैसे ही जन्मे ब्राह्मण के घर, शूद्र कर्म सो होवे शूदर।

      वनिज करे तो वैश्य कहावे, युद्ध करे क्षत्रिय पद पावे।

      कर्म करे जो जैसा जैसा, वर्ण पाय वह तैसा तैसा।

      धर्मचर्य्यया जघन्यो वर्णः पूर्वं पूर्वं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ।।१।।

      अधर्मचर्य्यया पूर्वोंवर्णोंजघन्यंजघन्यं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ।।२।।

                                    – आपस्तम्ब सूत्र

      उच्च वर्ण के पापाचारी, नीच वर्ण पावें नर नारी।

      नीच वर्ण हों उत्तम कर्मी, उत्तम वर्ण पाँय जो धर्मी।

      ताँते सिद्ध हुआ यह प्यारे, कर्म डुबावे, कर्म उबारे।

      कर्म जन्य हो वर्ण व्यवस्था, रहे जाति की शुद्ध अवस्था।

      विप्र कर्म ब्राह्मण नहीं छोड़े, जाति च्युत हो जो कोई तोड़े।

      क्षात्र धर्म क्षत्रिय नहीं त्यागे, वर्ण धर्म में सब जन लागे।

      जन्म जात जाति के ब्राह्मण, माँज रहे घर घर में बर्तन।

      क्षत्रिय हैं बल विक्रम हीना, घर घर डोलहिं उदर अधीना।

      जन्म जात जाति अभिमानी, करे देश की गहरी हानि।

      जो मानहु गुण कर्म स्वभावा, वा को उत्तम होय प्रभावा।

      कर्म हीन कोउ होय न जाति, कुल मँह संकरता नहीं आती।

प्रश्न

      स्वामिन शंका एक निवारो, बात विचारन जोग विचारो।

      एक पुत्र जिसके हाँ होवे, वह आयु भर बैठा रोवे।

      दूसर वर्ण जाय वह धारे, वृद्ध पिता को कौन सम्हारे।

      कौन करे पितु माता सेवा, नहीं कोऊ रहा नाम का लेवा।

      अपना सुत तो भया पराया, बदल गया हा निज का जाया।

      कर्म व्यवस्था घर की भेदन, जिसते होय वंश उच्छेदन।

उत्तर

      सेवा भंग न कुल को नाशा, तोड़ें तनिक मोह की पाशा।

      इक सुत बदले दूसर आवे, अपर योग्य कोऊ बेटा पावे।

      दोनों विद्या राज सभाएँ, कर्म देख संतति बदलाएं।

      वर्ण व्यवस्था बिगरे नाँहीं, दोष न आवे जाति माँही।

      जबहुं षोडशी होवे बाला, परखें सभा तिनहिं तत्काला।

      पच्चिस की हो युवक अवस्था, परख परख दे वर्ण व्यवस्था।

      ब्राह्मण सों ब्राह्मणी विवाहे, छत्राणी छत्री घर जाए।

      वैश्या वैश्य शूद्र शूद्राणी, ब्याह करें नहीं होवे हानि।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)