०५३ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (०४)

चतुर्थ समुल्लासःभाग (०४)

स्वाध्यायेन जपैर्हो मैस्त्रैविद्येनेज्यया सुतैः।

      महायज्ञेश्च यज्ञैश्च ब्राह्यीयं क्रियते तनुः।।

                                    – मनु० २ । २८

      स्वाध्याय जप होम प्रयोगा, साङगोपाङग वेद अरु योगा।

      चन्द्र पूर्णिमा इज्या इष्टि, सत्संगति अरु सम्यग्दृष्टि।

      पंच यज्ञ वा अग्निष्टोमा, सत्य वचन सत्कर्मी होना।

      शिल्प कला पढ़ पूर्ण प्रवीना, मिथ्याचार विचार विहीना।

      चरितवान होवे उपकारी, तब ब्राह्मी तनु होय संवारी।

      क्या यह श्लोक न मानहु भ्राता, मनु तो सूधा मार्ग दिखाता।

      जो तुम मानहु मनु प्रमाना, पुन संशय क्यों मन में आना।

      रज वीरज से वर्ण न होवे, जान बूझ क्यों बुद्धि खोवे।

      जो तुम ऐसा समझो भाई, परम्परा ऐसी चलि आई।

      जन्मज मानहिं वर्ण सनातन, लोक रीति है यही पुरातन।

      बुद्धि भई विपरीत तुम्हारी, यह अब कैसे जाय सुधारी।

      पाँच सात पीढ़ी ते आई, प्रथा सनातन कैसे भाई।

      वेद सनातन जिसे बखनें, हम तो उसे पुरातन मानें।

      आदि सृष्टि में एक अवस्था, रही कर्म से वर्ण व्यवस्था।

      कछुक लोग मूरख अभिमानी, वर्णव्यवस्था तोड़ पुरानी।

      मनमानी जब करने लागे, पेट स्वार्थ सों भरने लागे।

      अति विचित्र देखा संसारा, पिता पुत्र मँह अन्तर भारा।   

      पिता दुष्ट सुत शुद्धाचारी, पुत्र सचरित पिता व्यभिचारी।

      पिता पुत्र दोनों भल देखे, दोनों नीच कहीं अवलेखे।

      कुछ पीढ़ी से हुए अनारज, छाँड दई जिन रीति आरज।

      येनास्य पितरो याता येन याता पितामहाः।

      तेन यायात्सतां मार्गं तेन गच्छन्न रिष्यते।।

                                    – मनु० ४ । १७८

      पिता पितामह का जो मारग, वही मार्ग है तात सुमारग।

      चले उसी पथ पर सन्ताना, यही बखानें वेद पुराना।

      यदि सन्मारग पुरखा त्यागें, उनके पथ पर भूल न लागें।

      जो धर्मीं सत पथ पर जावें, उनके अनुचर दुःख न पावें।

      वेद सत्य ईश्वर की वाणी, वही सनातन सत्यश् पुरानी।

      वही पुरुषों का पुरुष पुरातन, माननीय वह सत्य सनातन।

      वेद विरुध नहीं वचन प्रमाना, रचे वेद ईश्वर भगवाना।

      जो नहीं मानें ईश्वर वाणी, सत्य त्याग करते मन मानी।

      उनसे प्रश्न करो तुम जाकर, युक्तियुक्त बातें समझा कर।

      यदि पिता हो चोर जुआरी, तो क्या बेटा होय खिलारी।

      पिता होय यदि कोऊ कंगाला, धन लुटाय सुत देय दिवाला।

      यदि पिता कोई अन्धा होवे, क्या सुत भी निज आखें खोवे।

      देखा सुना न कहीं कदापि, अन्धे मानें वही तथापि।

      तांते पुरखन उत्तम कर्मा, मानीय सब को यह धर्मा।

      दुष्ट कर्म त्यागहु तत्काला, जो चाहो निज देश संभाला।

      रज वीरज से जो कोई माने, कर्म योग से वर्ण न जाने।

      ब्राह्मण मुसलमान हो जाए, पुन ब्राह्मण क्यों नहीं कहलाये।

      तत्क्षण उत्तर दोगे ऐसा, कर्म हीन वह ब्राह्मण कैसा।

      ताँते सिद्ध हुआ यह भाई, जग में केवल कर्म बड़ाई।

      ब्राह्मण वह जो हो सत्कर्मा, अन्त्यज सो जो हो दुष्कर्मा।

प्रश्न

      ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।

      ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भया शूद्रो अजायत।।

                              – यजु० अ० ३१ । ११

      क्यों करते स्वामिन मनमानी, सुनिये यजुर्वेद की बानी।

      प्रभु के मुख से ब्राह्मण निकसे, बाहू से सब छत्री विगसे।

      पगसों शूद्र नीच सब तनमें, सकल वैश्य जंघा से जनमें।

      यही सत्य वर्णों के मांही, मानन योग बात तुव नाहीं।

      जिस घर जनमा सो तिस वरना, हेर फेर इसमें नहीं करना।

उत्तर

      अर्थ अनर्थ करो मत प्यारे, पुरुष सूक्त में मंत्र उचारे।

      पुरुष नाम व्यापक परमेश्वर, सर्वाधार प्रभु सर्वेश्वर।

      निराकार नहीं कोऊ आकारा, उसी पुरुष का सकल पसारा।

      हाथ पाँव मुख जंघा होना, किमि अंगों से उत्पन्न कीना।

      भुजा नहीं पर भुज सों जन्में, तनिक विचारो अपने मन में।

      यही दोष वदतो व्याघाता, पिता नहीं पर सुत उपजाता।

      व्यापक नहीं जो है साकारा, निराकार नहीं अगों वारा।

      सर्व शक्तिमय जग का कर्ता, पालन कर्ता धर्ता हर्ता।

      पुण्य पाप के फल का दाता, अजर अजन्मा जन्म न पाता।

      पारब्रह्म के गुण यह सारे, मिथ्या अर्थ करो तुम न्यारे।

      साँचे अर्थ सुनहु धर ध्याना, कैसे भये वर्ण यह नाना।

      चार वर्ण मँह ब्राह्मण मुखिया, धन संतोष पाप है सुखिया।

      बल बीरज बाहू को नामा, क्षत्रिय करहिं बाहू को कामा।

      देश विदेश करहिं व्यापारा, वैश्य जगत में विचरन हारा।

      है पर्यटन जाँघ को कर्मा, वैश्य करे चल फिर निज धर्मा।

      देह माँझ नीचे जिमि चरणा, तैसे नीच शूद्र को वर्णा।

      यस्मादेते मुख्यास्तस्मान्मुखतो ह्यसृज्यन्त। इत्यादि।  – शतपथ०

      ब्राह्मण मुख से होते उत्पन, मुखाकार होते उनके तन।

      भुज सम छत्री सर्पाकारा, वैश्य रूप हों जंघाकारा।

      सब वर्णों के भिन्न शरीरा, कोई कद्दु कोई घीया खीरा।

      उपादान हो जैसा जाँका, रूपाकार होय मिति ताँका।

      जो यह युक्ति होय तुम्हारी, आदि सृष्टि के जो नर नारी।

      वे जन्मे मुख बाहू पग से, चारहु वर्ण भिन्न भिन्न मग से।

      तब से स्थापित वर्ण हमारे, ब्राह्मण क्षत्रिय आदिक सारे।

      सुनहु मित्र तुव मिथ्या युक्ति, वेदों में नहीं ऐसी उक्ति।

      वरं नहीं तुम मुखज महाशय, तुम लेटे जनमें गर्भाशय।

      जैसे जनमें सब संसारा, वैसे होवे जन्म तुम्हारा।

      तांते तज मिथ्या अभिमाना, क्या कहते हैं मनु भगवाना।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)