०५१ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (०२)

चतुर्थ समुल्लासःभाग (०२)

विवाह का समय और विधि

दोहा

      कन्या षोडश वर्ष से, चौबीस वर्ष पर्यन्त।

      पच्चिस से अड़तालिस पर, ब्याहे वर उपरंत।।

चौपाई

      जुगल जोड़ी चौबीस अड़ताली, सर्वोत्तम उत्तम गुण वाली।

      तीस अठारह मध्यम जाने, सोलह चौबिस नीच बखानें।

दोहा

      ब्रह्मचर्य पालन सहित, इन विधिं जहाँ विवाह।

      वही देश उन्नति करें, पावहिं सुख अथाह।।

चौपाई

      ब्रह्मचर्य पालन जँह नाँहीं, करें ब्याह बालापन माँही।

      डूबे देश जाति वह सारी, पड़े जाय दुख सागर खारी।

      पूरन ब्रह्मचर्य विद्वाना, कर विवाह पावहिं सुख नाना।।

      ब्याह सुधारे जाति सुधरे, पंक पतित यह जाति उधरे।

      ब्याह रीति मँह होय बिगारा, कबहुं न होवे देश सुधारा।।

प्रश्न

      अष्टवर्षा भवेद् गौरी नववर्षा च रोहिणी।

      दशवर्षा भवेत्कन्या तत ऊर्ध्व रजस्वला।। १ ।।

      माता चैव पिता तस्या ज्येष्ठो भ्राता तथैव च।

      त्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्टवा कन्यां रजस्वलाम्।।२।।

दोहा

      आठ वर्ष की बालिका, सो गौरी कहलाय।

      नौ बर्सो की रोहिणी, कन्या दशम सुहाय।।

चौपाई

      पुन कन्या पुन रजका दर्शन, महा पाप तस दर्सन पर्सन।

      पिता मातु अरु जेठा भाई, नर्क जाँय तस दर्सन पाई।

      कन्या रज दर्सन ते पूरव, ब्याहे पाए पुण्य अपूरव।

उत्तर

      एकक्षणा भवेद् गौरी द्विक्षणेयन्तु रोहिणी।

      त्रिक्षणा सा भवेत्कन्या ह्यत ऊर्ध्व रजस्वला।। १ ।।

      माता पिता तथा भ्राता मातुलो भगिनी स्वका।

      सर्वे ते नरकं यान्ति दृष्ट्वाव कन्यां रजस्वलाम्।। २ ।।

चौपाई

      सुनहु मित्र ब्रह्मा की बानी, क्यों करते अपनी मनमानी।

      सद्यो निर्मित ब्रह्म पुराना, आयु दे ब्रह्म भगवाना।

      छिन मँह गौरी बनती बाला, होय रोहिणी द्वै छिन काला।

      तीजे छिन कन्या हो जावे, रजोधर्मिणी पुन कहलावे।

      रजस्वला का जो मुख देखे, महा पाप जसु होंय न लेखे।

      माता पिता बहन अरु भाई, मामा मामी फूफी ताई।

      नरक माँझ सबका हो वासा, सकल पुण्य का होय विनासा।

      क्यों नहीं मानो श्लोक प्रमाना, सद्यो निर्मित ब्रह्म पुराना।

      काशीनाथ सत्य क्यों मानें, क्यों नहीं ब्रह्मा वचन प्रमानें।

      काशीनाथ कलियुग का ज्ञानी, सत्ययुगी ब्रह्मा की बानी।

प्रश्न

      निपट असंभव श्लोक तुम्हारे, वे मानहिं जो हो मतवारे।

      जन्मत ही बहु छिन लग जावें, कैसे उसका ब्याह करावें।

      ऐसे ब्याह का फल क्या होवे, दूल्हा नाचे गुड़िया रोवे।

उत्तर

      यदि असंभव श्लोक हमारे, तो संभव क्यों श्लोक तुम्हारे।

      आठ वर्ष की निष्फल शादी, देश जाति निज की बरबादी।

      सोलह की आयु मँह नारी, होय गर्भ के धारण हारी।

      इससे पूरव अंग अधूरे, भोग योग होवें नहीं पूरे।

      महा पाप है बाल विवाहा, दुख दायक अति कष्ट अथाहा।

      लाखों मर रही कन्या बाला, दिन दिन बढ़ रही मृत्यु अकाला।

      बच्चों की कछु गिनती नाँहीं, चले जाँय मृत्यु मुख माँहीं।

      मरहिं बाल और उनकी मैय्या, घर घर में रोगिन की शय्या।

      बाल विवाह के कड़वे यह फल, मरी जाय जाति सब जल जल।

      जो कन्या पुन होवे काली, वह गौरी क्या बात निराली।

      गौरी रोहिणी नाम असंगत, गोरी संज्ञा काली रंगत।

      वासुदेव की रोहिणी नारी, महादेव की गौरी प्यारी।

      तिनहिं पौराणिक माता मानहिं, कन्याएं गौरी सब जानहिं।

      पाणिग्रहणं उनका किम करिये, मातृभाव क्यों कर परिहरिये।

      दोनों मिथ्या श्लोक तुम्हारे, सद्यो निर्मित झूठ हमारे।

      नाम पाराशर तुमने लीना, ब्रह्मा लेख हमने कह दीना।

दोहा

      ब्रह्मादिक के नाम से, रच डारे बहु श्लोक।

      ऐसे कपटी नरन का नशहि लोक परलोक।।

चौपाई

      तज इनको गह वेद प्रमाता, सत्य मार्ग चाहो प्रगटाना।

      त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कुमार्युतुमती सती।

      ऊर्ध्वं तु कालादेतस्माद्विन्देत सदृशं पतिम्।।            – मनु० १। १०

      काममामरणात्तिष्ठेद् गृहे कन्यर्तुमत्यपि।

      न चैवैनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कहिंचित्।।        – मनु० १। ८१

दोहा

      कन्या होय रजस्वला, तीन वर्ष पर्य्यन्त।

      निज सदृश कर खोज कर, ब्याहे सुन्दर कंत।।

चौपाई

      भली मरण तक रहे कँवारी, निर्गुण वर नहीं ब्याहे नारीं।

      तांते बाल विवाह न करना, या विवाह ते अच्छा मरना।

प्रश्न

      महाराज इक शंका मोरी,दूर करें कर कृपा बहोरी।

      वर कन्या जब ब्याह करावें, समुचित अनुमति किसकी पावें।

      माता पिता की आज्ञा पाएं, निज इच्छा से या करवाएं।

उत्तर

      उत्तम जानहु वही विवाहा, वर कन्या का हो चित चाहा।

      माता पिता यदि चहें विवाहन, चाहें निज कर्त्तव्य निबाहन।

      वर कन्या की स्वीकृति लेवें, पुन विवाह की सम्मति देवें।

      यदि सहमत नहीं बालक बाला, ब्याह विचार तजें तत्काला।

      लड़का लड़की दोनों चाहें, निज सम्मति से ब्याह कराएं।

      माता पिता का क्या परयोजन, भूखे की इच्छा पर भोजन।

      भला इसी में माता पिता का, मन से मिलें चंद्र अरु राका।

      सुख सों बसें बाल अरु बाला, मात पिता हो जाँय निहाला।            

ब्याह नहीं होवे मनमाना, तो जीवन भर क्लेश उठाना।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)