०५० स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (०१)

चतुर्थ समुल्लासः भाग (०१)

      अथ समावर्त्तनविवाहगृहाश्रमविधिं वक्ष्यामः।

      वेदानधीत्य वेदौ वा वेदं वापि यथाक्रमम्।

      अविप्लुतब्रह्मचर्यो गृहस्थाश्रममाविशेत्।।१।।

      तं प्रतीतं स्वधर्मेण ब्रह्मदायहरं पितुः।     

      स्त्रग्विणं तल्प आसीनमर्हयेत्प्रथमं गवा।।२।।

      गुरुणानुमतः स्त्रात्वा समावृत्तो यथाविधि।

      उद्वहेत द्विजो भार्यां सवर्णां लक्षणान्विताम्।।३।।  – मनुस्मृति

दोहा

      पूरन विद्या प्राप्त कर, ब्रह्मचर्य व्रतधार।

      करहि प्रवेश गृहस्थ मंह, आर्य धर्म अनुसार।।

      माला डाले कंठ में, वर को पलंग पौढ़ाय।

      मान करे गोदान से, गुरु कन्या पितु आय।।

चौपाई

      गुरु की आज्ञा ले ब्रह्मचारी, गृह प्रवेश की करे तयारी।

      न्हाय धोय गुरुकुल से आवे, शुभ कन्या सों ब्याह करावे।

      आत्म वर्ण कन्या अनुकूला, सुभग सुलच्छित सुख की मूला।

      माता की छः पीढ़ी तजिये, पितृ गोत्र कन्या नहीं भजिये।

      नयन ओट जो हों पदारथ, वा संग प्रीति रहे यथारथ।

      जो नयनन नित देखी भाली, वहां न रहे नयन की लाली।

      मिसरी सुनी वरं नहीं खाई, रहे प्रबल इच्छा मन भाई।

      अनदेखी वस्तु मँह प्रीति, होत सदा यह जग की रीति।

      तिमि कन्या दूरस्थ विवाहा, वँधी रहे प्रीति अरु चाहा।

      ताँते मातृ पिण्ड को त्यागे, पितृ गोत्र के निकट न लागे।

      निकट सबन्ध दोष अतिरेका, सुनहु जो वर्णहिं शास्त्र अनेका।

      बाल्यकाल मँह हिलमिल खेले, झगड़े लड़े मनाए मेले।

      उछले कूदे नंगे धड़ंगे, कीच धूलि माटी मँह रंगे।

      परिचित सभी बुराई, उचित न वहाँ विवाह सगाई।

      असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः।

      सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने।।४।।

                                          – मनु० ३ । ५

      परोक्षपिप्रया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः।।         – शतपथ०

      प्रेम प्रीति का वहाँ न वासा, जब लग जीवहिं भरहिं उसासा।

      दूसर दोष शास्त्र कहें भारा, जिसे अनारज लोग बिसारा।

      पानी मँह पानी मिल जाए, वह जल नया रंग नहीं लाए।

      त्यों पितु गोत्र वंश जननी की, निर्गुण निरस विवाह में फीकी।

      धातुन का नहीं हो परिवर्तन, नहीं आवर्तन प्रत्यावर्तन।

      निर्गुण मूढ़ रहे सन्ताना, तनिक न उन्नति हो हौं जाना।

      यथा दूध मँह मिसरी घोले, स्वाद सरसता मुख से बोले।

      उत्तम गुण पय मँह आ जाएँ, शुठी आदिक द्रव्य मिलाएँ।

      ताँते अन्य गोत्र मँह ब्याहो, जो तुम उत्तम सन्तति चाहो।

      रोगी अन्य देश में जावे, जल वायु जाकर बदलावे।

      इह विध दूर गोत्र की बाला, ब्याहे हो उत्तम गुण वाला।

      निकट ब्याह ते नित्य लड़ाई, उपालम्भ अरु जगत हँसाई।

      बढ़े दूर से नेह की डोरी, पत्नी रहे पति रंग बोरी।

      नया देश नयी नयी बातें, दूर देश की मिलें सौगातें।

      तांते निकट ब्याह नहीं करिये, मातृ पितृ जाति परिहरिये।

      दुहिता दुर्हिता दूरेहिता भवतीति।।               – निरुक्त ३।४

      कन्या का ‘दुहिता’ है नामा, दूर रहे कन्या हित कामा।

      जो कन्या पितु निर्धन होवे, पति घर में नहीं सुख सों सोवे।

      जब जब वह माता घर आवे, तब ही तब कुछ संग ले जावे।

      निकट होय जो माता का घर,रखे न पत्नी स्वामी का डर।

      उसके मन मँह हो अभिमाना, स्वामी का करदे अपमाना।

      रार बढ़े पितृ गृह जावे, नित का झगड़ा कौन मिटावे।

      महान्त्यपि समृद्धानि गोऽजाविधनधान्यतः।

      स्त्रीसम्बन्धे दशैतानि कुलानि परिवर्जयेत्।। १ ।।

                                          – मनु० ३।६

      हीनक्रियं निष्पुरुषं निश्छन्दो रोमशार्शसम्।

      क्षय्यामयाव्यपस्मारिश्वित्रिकुष्ठिकुलानि च।। १ ।।  – मनु० ३ । ७

      नोद्वहेत्कपिलां कन्यां नाऽधिकाग्ङी न रोगिणीम्।

      नालोमिकां नातिलोमां न वाचाटान्न पिङगलाम्।। ३ ।। – मनु० ३। ८

      नर्क्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्त्यपर्वतनामिकाम्।

      न पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषणनामिकाम्।। ४ ।। – मनु० ३ । ९

      मनु लिखित यह दश कुल त्यागे, लाच के वश कबहुँ न लागे।

      राज्य लक्ष्म हाथी घोड़े, दीनारों के मिल जाएं तोड़े।

      अजा गाय धन अरु हो धाना, ऐसे कुल नहीं ब्याह कराना।

      क्रियाहीन सत्पुरुष न जिसमें, वेद विमुख जो कुल हो तिसमें।

      अर्श श्वास क्षय युक्त कुलन में, बडे बाल हों जिनके तनमें।

      धित्रकुष्ठ आमाशय व्याधि, इन वंशन में करे न शादी।

      संक्रामक यह रोग भयंकर, रज वीरज में पावें संकर।

      इनका होय न और प्रसारन, एते कुल वरजे एहि कारण।

      पीत वर्ण कन्या अधिकांगी, नर सों लंबी चौड़ी छांगी।

      लोम रहित लोमश वाचाली, रोगिन पिंगल नयनों वाली।

      नखत वृक्ष नद पर्वत नामा, पक्षी सर्प नामिका वामा।

      प्रेष्य भयंकर नामों वाली, जैसे भीमा चण्डी काली।

      निन्दित दनाम शास्त्र ने माने, ब्याह सम्बन्ध योग नहीं जाने।

      अव्यङगाङगीं सौम्यनाम्नीं हंसवारणगामिनीम्।

      तनुलोमकेशदशनां मृद्वङगीमुद्वहेत्स्त्रियम्।। ५ ।।

                                          – मनु० ३ । १०

      हंस हस्ति गति सुन्दर बाला, सरलांगी तनु दशन सुचाला।

      सूक्ष्म रोमिका देह गठीली, मृदु चिकुरा मधु बयनि छबीली।

      ऐसी कन्या का कर गहिये, तो जीवन भर सुख सों रहिये।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)