०४९ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (२७)

तृतीय समुल्लास भाग (२७)

चौपाई

            पुरुष पठित अरु अनपढ़ नारी, किस विधि दोनों हों सहचारी।

            घर मह होवे नित्य लड़ाई, सुख सम्पति सब दूर नशाई।

            किमि अनपढ़ गृह काज सम्हारे, वह तो उल्टे काज बिगारे।

            कैकेयी दशरथ की रानी, धनुर्वेद मंह चतुर सयानी।

            रण मंह पति की भई सहायक, आपत्काल बचावे नायक।

            तांते ब्राह्मणि अरु छत्रानी, इन मंह विद्या सकल प्रानी।

            वैश्या की विद्या व्यवहारी, सिखै रसोई शूद्र नारी।

            नारी सीखे विद्या नाना, व्याकरणादिक पुरुष समाना।

            शिल्प गणित वैद्यक पढ़ जावे, थोड़ी थोड़ी अवस सिखावे।

            जो नारी विद्या की कोरी, कैसे काज चलावे भोरी।

            क्योंकर सत्यासत्य विचारे, कैसे गृह के कार्य संवारे।

            कैसे रहे पति अनुकूला, संतति पालन ज्ञान न मूला।     

            संतति के किमि चरित सुधारे, कैसे गृह के रोग निवारे।

            कैसे टूटा घर बनवाए, सुन्दर भूषण किमि गढ़वाए।

            व्यर्थ खर्च मत होवे पैसे, अनपढ़ नारी समझे कैसे।

            नित्य करे जड़ जापू टोने, पड़े रहें घर मँह नित रोने।

            जिसने निज सन्तान पढ़ाई, धन्य पुरुष वह धन्य लुगाई।

            पठित बाल जानहि व्यवहारा, मात पिता सब का वह प्यारा।

            सास ससुर और सखा सहेली, सब को रखे प्रसन्न नवेली।

            ओस पड़ोसी प्रीतम प्यारे, पठित पुरुष को चाहें सारे।

            यह विद्या अक्षय भण्डारा, खर्च करने से बढ़ने हारा।

            घट जाते हैं सभी खजाने, विद्या कोष घटन नहीं जाने।

            नहीं कोउ इसको चोर चुराए, दया भाग कोउ छीन न पाए।

            नृपति प्रजा दोउन को धर्मा, विद्या कोष बढ़ावन कर्मा।

            यह कर्तव्य नृपति का भारी, अनपढ़ रहे न को नर नारी।

            आठ वर्ष की आयु अवन्तर, गुरुकुल में सब रहे निरन्तर।

            जो नहीं मानें नर उद्दंडा, वाके मात पितहिं दे दण्डा।

            जब तक पढ़ कर लौट न आवे, कोउ विवाह न करने पावे।

            कन्यानां सम्प्रदानं च कुमाराणां च रक्षणम्।।  – मनु० ७ । १५२

            सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मदानं विशिष्यते।

            वार्यन्नगोमहीवासस्तिलका९चनसर्षिषाम्।।   – मनु० ४ । १३३

चौपाई

            जग मँह बहु प्रकार के दाना, स्वर्ण अन्न घृत आदिक नाना।

            वेद दान पर दान महाना, या ते सब का हो कल्याना।

            यथा शक्ति तांते कर जतना, वेद धर्म का होय न पतना।

            वेद शास्त्र का डंका बाजे, सुख सम्पति सब ठौर विराजे।

इति श्री आर्य महाकवि जयगोपाल विरचिते सत्यार्थ प्रकाश

कवितामृते तृतीयः समुल्लासः समाप्तः।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)