०४८ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (२६)

तृतीय समुल्लास भाग (२६)

प्रश्न

स्त्रीशूद्रौ नाधीयातामिति श्रुतेः

            कहिये प्रभु्! शुद्र अरु नारी, वेद पठन के हैं अधिकारी।

            जो यह वेद पठन मँह लागे, तो ब्राह्मण क्या करहिं अभागे।

            लखिये वेद स्वयं परमाना, नारी शूदर नहीं पढ़ाना।

उत्तर

            श्रुति विरुद्ध यह वचन तुम्हारा, मान न पाए हृदय हमारा।

            पढ़ने का सबको अधिकारा, ब्राह्मण हो वा होय चमारा।

            पड़े कूप मँह श्रुति तुम्हारी, मन घड़न्त यह लीला सारी।

            यजुर्वेद छब्बिस अध्याये, वेद पठन अधिकार बताये।

सथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेंभ्यः।

ब्रह्मराज्रन्याभ्या शूद्राय चायींय च स्वाय चारणाय।। – यजु० २६

            स्वयं ब्रह्म इमि कहते प्यारे, चार वेद मंह वचन हमारे।

            यह वाणी कल्याण की कारक, मनुष मात्र की है उपकारक।

            तुम भी सब को जाय सुनाओ, सब का भला करो सुख पाओ।

            ब्राह्मण क्षत्रिय नहीं कोऊ भेद, वैश्य शूद्र सब पढ़ लें वेदा।

            अतहि शूद्र किंकर अरु नारी, मम वाणी के सब अधिकारी।

            वेद सभी जन पढ़ें पढ़ावें, गहें भला बुरा टुकावें।

            एक ओर ईश्वर की वाणी, एक ओर तुमरी मनमानी।

            तुमहिं कहो किस को अपनावें, सत्य झूठ किस को ठहरावें।

            परमेश्वर का वचन प्रमाना, नास्तिक सो जिसने नहीं माना।

            वह नास्तिक जो वेद न माने, वह नास्तिक जो श्रुति अपमाने।

            तनिक सोच तू मन मंह भाई, ईश न चाहे शूद्र भलाई।

            पक्षपात ईश्वर के मन में, रखे भेद शूद्र ब्राह्मण में।

            ईश द्विजों को वेद सुनावे, शूद्रों को जड़ मुक बनावे।

            आँख कान ब्राह्मण को दीने, अन्धे बहरे शूद्र न कीने।

            सब कँह दीने अंग समाना, हाथ पाँव नाक अरु काना।

            अग्नि जल आकाश समीरा, सब कँह दिये समान शरीरा।

            सूरज चांद नछत्तर तारक, प्राणि मात्र के हैं उपकारक।

            सब जन हेत वेद परकासा, सब के मन मँह प्रभु निवासा।

            केवल उसके लिये निषेधा, जो मूरख राखे नहीं मेधा।

            चाहे कितना पढ़े पढ़ाये, फिर भी उसको समझ न आए।

            वह नर जड़ मति मूर्ख कहाये, वृथा न उस पर समय गंवाये।

            नारी हित जो तोर विचार, इसमें नहीं तनिक भी सारा।

            यह कोरी मूरखता स्वारथ, भूल गये तुम सब परमारथ।

            कन्याओं को उचित पढ़ाना, तुम्हें सुनाऊं वेद प्रमाना।

            ब्रह्यचर्य्येण कन्या३ युवानं विन्दते पतिम्।।

                        – अथर्व० ।। अनु० ३ । प्र० २४ । कां० ११ । मं० १८।।

            कन्या ब्रह्मचर्य कर धारन, वेद शास्त्र का करके पारन।

            युवती होय विवाह कराये, अपने सदृश पति वर पावे।

सोरठा

इमं मन्त्रं पत्नी पठेत, श्रीत सूत्र का वचन यह।

हवन करे निज पति संग, वेद पढ़े बिन होय किम।।

दोहा

            पूरन विदूषी गार्गी, हुई पुरातन काल।

            शतपथ ब्राह्मण में लिखा, झूठ न हो त्रैकाल।।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)