०४७ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (२५)

तृतीय समुल्लास भाग (२५)

अथ विद्या पठन पाठन के विघन

            पठन काल मंह विघ्न जो आवें, उन्हें दूर कर पढ़ें पढ़ावें।

            विषयी लंपट दुष्ट कुसंगा, इन को त्याग करे सत्संगा।

            वेश्यागम ओर मद पाना, बाल्य काल मँह विवाह कराना।

            जाको ब्रह्मचर्य नहीं होवें, वह दुर्भग आयु भर रोवें।

            जो नृप मात पिता विद्वाना, वेद शास्त्र का करे न माना।

            रखे न प्रेम वेद प्रचारे, उस से सब सम्बन्ध तज डारे।

            अति जागमण छांड़ अति खाना, विद्या में दोऊ विघन प्रधाना।

            पाठन पइन परीक्षा काले, इन में आलस करने वाले।

            श्रेष्ठ न जाने विद्या पाना, यह भी जानहु विघन महाना।

            बल बुद्धि धन राज्य अरोगा, यह सब ब्रह्मचर्य सों होगा।

            जिस मूरख ने नहीं अस जाना, उसका पढ़ना व्यर्थ पढ़ाना।

            पाथर पूजे समय गवावे, पारब्रह्म मन में नहीं ध्यावे।

            मात पिता गुरु की सतमूरत, तजे जो इनकी पूजा धूरत।

            उसकी विद्या निष्फल जाए, पढ़ा लिखा कुछ काम न आए।

            वर्णाश्रम तज तिलक लगाना, कण्ठी माल त्रिपुण्ड सजाना।

            व्रत तीरथ यात्रा जप जापा, माने इन ते छूटे पापा।

            विद्या विघन झूठ विश्वासा, वे विद्या की रखें न आसा।

            पाखण्डी मूरख बकवादी, विद्या वैरी बकहिं प्रमादी।

            बात न इनकी सुने सुजाना, यह विद्या मँह विघन समाना।

            विद्या योग ईश की भक्ति, इतने चित्त मँह रखे विरक्ति।

            कथा पुराणन मुक्ति माने, वह विद्या कबहुं नहीं जाने।

            व्यर्थ डोलना धन कर लोभा, उन्हं न देती विद्या शोभा।

            वामण साधु निपट निरक्षर, अंट संट दो पढ़ कर अक्षर।

            विद्या पढ़ना बुरा बतावें, भोले जन पर जाल बिछावें।

            लूट लूट पर संपति खाते, धूर्त पाखण्डी नहीं लजाते।

            डरहिं न क्षत्रिय हों विद्वाना, पढ़ हमरा करिहैं अपमाना।

            प्रजा प्रजापति ध्यान लगावें, इन विघ्रन कह वेगि हटावें।

            कन्या हो वा होवे बालक, सब को विद्या दे गृह पालक।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)