०४५ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (२३)

तृतीय समुल्लास भाग (२३)

चौपाई

            ऋषि मुनि रहे बड़े विद्वाना, धर्मातम अरु हृदय महाना।

            पक्षपात मन मांहि न राखें, गुप्त न राखें सूनृत भाखें।

            उनके ग्रन्थ परम उपयोगी, वे साँचे साधु और योगी।

            पूर्व मीमांसा शास्त्र महाना, व्यासदेव मुनि कृत विख्याना।

            वैशेषिक दर्शन परमोत्तम, भाष्य किया जाका ऋषि गौतम।

            न्याय सूत्र पर मुनि वात्स्यायन, कीना भाष्य सुगमता आयन।

            दर्शन सांख्य कपिल कृत जाना, जागुरि कृत व्याख्यान सुहाना।

            सूत्र वेदान्त रचे मुनि व्यासा, वात्स्यायन कृत सुन्दर भाषा।

            बौद्धायन वा व्याख्या कीनी, वृत्ति टीका टिप्पणी दीनी।

            योग शास्त्र कँह रचा पंतजलि, सागर भरा मनहु इक अंजलि।

            कल्प अंग यह दर्शन जानें, मुनि महर्षि ऐसा मानें।

            ऋग यजु साम अथर्वन नामा, वेद रचे प्रभु जग हित कामा।

            ऐतरेय गोपथ साम रु शतपथ, आर्ष ग्रन्थ दिखलावें सतपथ।

            शिक्षा कल्प निघण्टु छन्दा, शब्द शास्त्र निर्वचन अमंदा।

            ज्योतिष सकल वेद के अंगा, षट् दर्शन हैं वेद उपंगा।

            धनु गंधर्व आयु अरु अर्था, चतुर्वेद उपवेद समर्था।       

            ऋषि गण यह सब ग्रंथ रचाये, इन ग्रन्थन को पढ़े पढ़ाये।

            इन मंह जे जे वेद विरुद्धा, हों प्रतीत तज नर बुद्धा।

            भ्राँति हीन ईश्वरकृत वेदा, स्वतः प्रमाण मान मत भेदा।

            वेदों का वेदहि परमाना, भ्राँति हीन ईश्वर निर्माना।

            शेष शास्त्र परतः परमानें, वेदाधीन प्रमाणिक मानें।

अथ परित्याग योग ग्रंथ

            शेखर कौमुदि शब्दन जाला, मनोरमा मिथ्या जंजाला।

            सारस्वत का तन्त्र प्रपंचा, आर्ष ग्रन्थ कंचन यह कंचा।

            सारस्वत चन्द्रिका निरर्थक, पंडित वर्ग न होंय समर्थक।

            मुग्ध बोध निर्बोध अबोधा, बर्सों पढ़िये होंय न बोधा।

            इन को वैयाकरणी त्यागे, ऋषि ग्रंथों में मन अनुरागे।

            अमरकोष कोषों में तजिये, ऋषि कृत कोष निघण्टु भजिये।

            छन्द शास्त्र में वृत रतनाकर, रत्नाकर नहीं हैं पतनाकर।

सोरठा

            पाणिनीयं मतं यथा, अथ शिक्षां प्रवक्ष्यामि।

            माखन हित जल को मथा, शिक्षा में यह त्यागिये।

चौपाई

            शीघ्रबोध ज्योतिष मंह तजिये, चिन्तामणि मुहूर्त न भजिये।

            काव्य माँहि यह ग्रन्थ निषेधा, कुत्सित वर्णन नायिका भेदा।

            कालीदास काव्य रघुवंशा, कुवलयानन्द माघ सब अंशा।

            अर्जुनीय किरातादिक कंह, ग्रंथ निषिद्ध चरित नहीं इन मँह।

            धर्म सिन्धु अरु अक्र व्रतादी, मीमाँसा में ग्रंथ प्रमादी।

            तर्क संग्रह जैसी पोथी, वैशेषिक मँह कोरी थोथी।

            जगदीशी तज न्याय के माँही, या में बात बुद्धि की नाँही।

दोहा

            तज दृढ़ योग प्रदीपिका, चहे जो योग सबोध।

            या पुस्तक का योग सों, पूरणतया विरोध।।

चौपाई

            सांख्य तत्व कौमुदी निरर्था, या को पढ़ खो समय न व्यर्था।

            पंचदशी और योग वसिष्ठा, यह वेदान्त के ग्रन्थ अनिष्ठा।

            वैद्यक में शारंगधर जैसे, ग्रन्थ नहीं उपयोगी ऐसे।

            मनु सिमरति प्रक्षित शलोका, पढ़े तो बिगड़े लोक परलोका।

            स्मृतियां अन्य सकल निस्सारा, तंत्र ग्रन्थ सब झूठ पसारा।

            उप पुराण अरु सभी पुराना, तत्त्व हीन निष्फल हौं जाना।

            तुलसी कृत रामायण तजिये, बालमीकि रामायण भजिये।

            रुक्मणि मंगल आदिक पोथे, भाषा के यह पुस्तक थोथे।

            मन गंढ़त मिथ्या अरु कोरे, इन को पढ़े बुद्धि के भोरे।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)