०४४ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (२२)

तृतीय समुल्लास भाग (२२)

स्थाणुरयं भारहारः किलाभूदधीत्य वेदं न विंजानाति योऽथम्।

योऽथज्ञ इत्सकल भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा।। – निरुक्त १ । १८

चौपाई

            वेद पढ़े पर अर्थ न जानहि, भारहार पशु सम तेहि मानहिं।

            अर्थ सहित जो जानहिं वेदा, ते नर पाँय ब्रह्म को भेदा।

            ज्ञानी के सब पाप नशावें, मृत्यु बाद परमानन्द पावें।

            उत त्वः पश्यन्न ददश्र वाचमुत त्वः शृण्वन्न शृणोत्येनाम्।

            उतो त्वस्मै तन्वं वि सस्त्रे जायेव पत्यं उशती सुवासाः।।

चौपाई

            जो मूरख अज्ञानी आहीं, सुनते हैं वरु सुनते नाहीं।

            अन्धे हैं पर रखते नैना, बोलत हैं वरु बोल न बैना।

            मूरख जान न सकहिं रहस्या, सुलझ न पावें कोउ समस्या।

            जो जानते है शब्दरु अर्था, ते ज्ञानी और सकल समर्था।

            जग में यथा पतिव्रत नारी, सुन्दर भूषण वस्त्र संवारी।

            पति सन्मुख निज रूप दिखवे, प्रियतम प्रेम पिपासा बुझावे।

            तेहि विधि विद्या है इक नारी, सुन्दर पद अरु अर्थ सिंगारी।

            ज्ञानी सों निज रूप प्रकासे, अज्ञानी कंह तुरत विनासे।

            ऋचो अक्षरें परमे व्योमन्यस्मिन्देवा अधि विश्वें निषेदुः।

            यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमें समासते।।

                                    – ऋ० मं० १ । सू० १६४ । मं० ३१।।

चौपाई

            व्यापक देव एक अविनाशी, पारब्रह्म घट घट को बासी।

            लोक सूर्य चन्द्रादिक नाना, जिस में स्थित हैं सब विद्वाना।

            जिसने उसका ज्ञान न पाया, जीवन उसने वृथा गँवाया।

            वेद पढ़े पर सुख नहीं पावे, अर्थ ज्ञान बिन भार उठावे।

            वेद पढ़ा अर्थों को जाना, योगी हो ईश्वर पहिचाना।

            परमानन्द उन्होंने पाया, मानुष जीवन सफल बनाया।

            चतुर्वेद पूरे कर पावे, आयुर्वेदहिं चित्त लगावे।

            ऋषि प्रणीत जे वैद्यक ग्रन्था, तिनका करे गहन अवमन्था।

            सुश्रुत चरक आदि बड़ ऊंचे, वैद्यक पुस्तक पढ़े समूचे।

            अर्थ क्रिया शस्त्रन सों छेदन, चीर फाड़ लेपन अरु भेदन।

            पथ्य चिकित्सा औषध नाना, भली भांति सब रोग निदाना।

            देह द्रव्य गुण देशरु काला, भिषग् होय पूरण गुण वाला।

            चार वर्ष मँह पूरन करिये, आयुर्वेदिक सागर तरिये।

            धनुर्वेद पुन कर अभ्यासा, जाते होवे शत्रु विनाशा।       

            धनुर्वेद के दो परकारा, राज्य सुरक्षा प्रजा सहारा।

            राज्य कार्य में सेनानायक, तोप बन्दूक और धनु सायक।

            अस्त्र शस्त्र मंह होय प्रवीना, लक्ष्य वेध जिमि अर्जुन कीना।

            व्यूह रचना सेना परिचालन, सैन्य प्रबन्धरू आज्ञा पालन।

            युद्ध कला जब होय लड़ाई, शत्रु देश पर सैन्य चढ़ाई।

            द्वितीय भेद प्रजा की वृद्धि, राज्य कार्य जिमि होवहि सिद्धि।

            न्याय सहित करना नित शासन, विकृत होय न राजनुशासन।

            दुष्टन दण्ड श्रेष्ठ प्रतिपाला, दीन दुःखी पर होय दयाला।

            इस प्रकार दो वर्ष लगावे, भुज बल सों नृप प्रजा रिझावे। 

            पुन गन्धर्व वेद को सीखे, कोमल स्वर और तीवर तीखे।

            राग रागिनी ग्राम रु ताला, कौन राग को क्या है काला।

            नृत वादित्र गीत अरु ताना, ओडव पाडव आदिक नाना।

            सीखे सामवेद को गाना, वीणा आदिक सहित सुजाना।

            नारदादि संहिता समाना, आर्ष ग्रन्थ कृत गान विधाना।

            भाँड मिरासी भडुए रंडी, विषयासक्त पाप की मण्डी।     

            वैरागिन गर्दभ आलापा, कबहुं न सीखे व्यर्थ प्रलापा।

            शिल्प ज्ञान वा वेद अथर्वा, कौशल क्रिया भरी जहाँ सर्वा।

            द्रव्य पदारथ गुण विज्ञाना, जितनी दीखें विद्या नाना।

            ज्योतिष बीज गणित भूगोला, अंक गणित भूगर्थ खगोला।

            हस्त यन्त्र कल सीखे सारे, पढ़ पढ़ाय जग माँहि प्रसारे।

            मिथ्या जन्म पत्र ग्रह राशि, निष्फल झूठे दुखद विनाशी।

            इन को कभी न पढ़े पढ़ाये, हो विद्वान् सदा सुख पाए।                     इस प्रकार जो पढ़ता प्राणी, बीस वर्ष मंह होवे ज्ञानी।

दोहा

            बीस वर्ष इमि पठन कर, होवहि नर विद्वान।

            अन्य विधि सों वर्ष शत, पढ़े न हो कल्यान।।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)