०४३ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (२१)

तृतीय समुल्लास भाग (२१)

कुण्डलिया

सारस्वत अरु चन्द्रिका, ग्रंथ सभी जंजाल।

यह कौमुदी मनोरमा, पढ़त पचासों साल।।

पढ़त पचासों साल जाल क्या व्यर्थ फैलाया।

खोदा बड़ा पहाड़ निकल इक मूषक आया।।

‘जयगोपाल’ पढ़ आर्ष ग्रन्थ सचमुच सारस्वत।

कुमति कौमुदी चंड चन्द्रिका साड़ सारस्वत।।

चौपाई

ऋषि जन का हो ऊँचा आशय, सरल भाव में कहें महाशय।

गूढ़ विषय मुनि करें प्रकासा, सहज भाव में होय विकासा।

क्षुद्र लोग नहीं राखें ज्ञाना, कल्पित अर्थ बतावें नाना।

रचना कठिन अल्प अति भावा, मथे नीर नवनीत न पावा।

आर्ष ग्रंथ सागर लहराये, मुक्ता पाए डुबहि लगाए।

पढ़ व्याकरण निघण्टु देखे, अचरज कर्म यास्क का पेखे।

क्या निरुक्त की सुंदर रचना, वैदिक शब्द किये निर्वचना।

आठ मास में पढ़े पढ़ज्ञवे, वैयाकरणी पूर्ण कहावे।

अमरकोष नास्तिक को कोषा, ताको पढ़ें तो होय सदोषा।

पिंगल मुनि कृत पढ़ले छन्दा, रचे छन्द मुदमय अनन्दा।

नव प्राचीन छन्द जंह नाना, वैदिक अरु लौकिक दोऊ ज्ञाना।

            चार मास मंह कीजे पूरा, छन्द ज्ञान नहीं रहे अधूरा।

            वृतरत्नाकर आदिक त्यागे, इन मँह समय व्यर्थ बहु लागे।

            बाल्मीकि मुनि रची रामायण, राम चरित सब सुख को आयन।

            संग संग वाचे महाभारत, विदुर नीति सब दुरित निवारत।

            मनु कृत मानव शास्त्र विचारे, पढ़ आचार विचार सुधारे।

            विधि पूर्वक आचार्य पढ़ावे, पदच्छेद करने सिखलावे।

            उक्ति पदारथ अन्वय आदि, पढ़े शिष्य मत होय प्रमादी।

            भली भाँति जानहि सब भावा, काव्य रीति अति मन हर्षावा।

            एक वर्ष में पूरण करिये, पुन छः दश्रन परिचित धरिये।

            साँख्य न्याय वैशेषिक योगा, द्रव्य पदारथ तर्क प्रयोगा।

            पढ़ वेदान्त सूत्र मीमाँसा, निष्फल जाय न एकहुं साँसा।

            ऋषि मुनि अथवा जो विद्वाना, उनकी व्याख्या सहज प्रमाना।

            उन्हें पढ़े गुरु उन्हें पढ़ाए, शिष्यहिं सहज बोध समझाए।

            सूत्र वेदान्त पठन ते पूरब, दश उपनिषदें पढ़े अपूरब।

            ईश केन कठ प्रश्न मंडूका, मुण्डक बृहदारण्य अनूपा।    

तैत्तिरीय ऐतरेय छन्दोगा, पढ़े जो होवे शिष्य सुयोगा।

            षट् दर्शन दो वर्षन माँही, पूरन करे तो अचरज नाही।

            चारों ब्राह्मण वेदहु चारा, छः वर्षों तक करे विचारा।

            शतपथ गोपथ एतर सामा, यह चारहु ब्राह्मण अभिरामा।

            वैदिक शब्द अर्थ सम्बन्धा, स्वर अरु क्रिया सहित अनुबंधा।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)