०४२ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (२०)

तृतीय समुल्लास भाग (२०)

पढ़ने पढ़ाने की विधि

दोहा

प्रथम पाणिनि मुनि की, ‘शिक्षा’ कंठ कराय।     

स्थान यत्न अक्षरन के, विधि सों दे बतलाय।।

चौपाई

जिमि पकार को ओष्ठ स्थाना,

स्पृष्ट प्रयतन होय शुभ ज्ञाना।

प्राण जीभ की क्रिया सुकरना,

‘प’ अक्षर इस रीति उचरना।

पुनः पाठ पढ़ अष्टाध्यायी,

पाणिनीय बिधि हो अनुयायी।

यथा सूत्र वृद्धिरादेचा,

पदच्छेद जिमि आत् अरु ऐचा।

आत् एच आदैच समासा,

पढ़ समास पुन अर्थ प्रकासा।

आ ऐ औ कँह वृद्धि भाखें,

परे तकार आत् क्यों राखें।

आगे पाछे होय तकारा,

जहाँ तपर तंह वृद्धि विकारा।

याको तात्पर्य यह जाने,

दीर्घाक्षर में वृद्धि माने।

लघु अकार नहीं वृद्धि पावे,

केवल दीर्घ वृद्ध हो जावे।

यथा उदाहरण लखिये भागा,

भज् धातु घ९ा प्रत्यय लागा।

इत् संज्ञक घ९ा् भये लोपा,

भज् अ ऐसा रूप अरोपा।

भज् के भ में लखें अकारा,

भया वृद्धि सों वहां विकारा।

भाज् रूप अब प्रत्यय कीना,

ज् के स्थानहिं न कर दीना।

इमि ‘भागः’ का भया प्रयोगा,

विन व्याकरण ज्ञान किमि होगा।

शब्द अन्य ‘अध्यायः’ लखिये,

अधि पूर्वक इङ् धातु रखिये।

इ आगे घ९ा् प्रत्यय राजे, तिहिं पाछे ऐकार विराजे।   

‘ऐ’ के स्थानहिं आय बनाया, या विधि बना शब्द स्वाध्याया।

देखें अन्य शबद इक ‘नायक’, नी९ा् धातु ‘एवुल’ लगा विधायक।

ई को ऐ पुन आय् विंकारा, मिल कर ‘नायक’ बना संवारा।

‘स्तु’ से स्तावक कृ से कारक, इनकी सिद्ध सीखे बारक।

सब सूत्रों के कार्य बतावे, पट्टी पर लिख लिख समझावे।

कच्चा रूप शबद अवतरिये, शब्द सिद्धि पुन चित्रित करिये।

धातु पाठ पुन अर्थ समेता, कण्ठ करावे विद्यावेता।

घोटे दश लकार के वर्गा, संग प्रक्रिया सूत्राोत्सर्गा।

‘कुंभकार’ में जिमि ‘कर्मण्यण’, धातु मात्र संग हो प्रत्यय ‘अण्’।

उपपद कर्म साथ यदि आवे, ‘कुंभकार’ इमि सिद्धि पावे।

तत्पश्चात् ‘सूत्र अपवादा’ पढ़े पढ़ावे त्याग प्रमादा।

‘आतोनुपसर्गेकः’ जैसे, नियम सामान्य न लगता ऐसे।

धात्वन्त हो दीर्घाकारा, अण् स्थाने कः प्रत्यय धारा।

उत्सर्गहु अपवाद निवारे, बल विशेष अपने मँह धारे।

चक्रवर्ति जिमि एक नरेशा, शासन करे सामन्तन देशा।

पाणिनि सहस सूत्र के अंदर, भरा गगरिया मांहि समुंदर।

गण उणादि मंह सर्व सुबन्ता, अष्टाध्यायि आदि सों अंता।

दूसर बार फेर दोहरावे, समाधान शंका कर पावे।

अष्टाध्यायी ज्ञान अनन्तर, महाभाष्य को पढ़े निरन्तर।

तीन वर्ष मंह दोनों ग्रन्थन, प्रज्ञावान करे अवमन्थन।

लोक वेद शब्दन कर ज्ञाना, पूरन पंडित हो विद्वाना।

शब्द शास्त्र में श्रम हो भारी, पाणिनि मुनि का जगत आभारी।

पढ़ें ग्रन्थ केवल यह आरष, पुस्तक भूल न पढ़ें अनारष।

महाभाष्य अरु अष्टाध्यायी, तीन वर्ष तक किये पढ़ाई।

यावत ज्ञान होय इन माँही, सो अनार्ष ग्रन्थों में नाँही।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)