०४१ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (१९)

तृतीय समुल्लास भाग (१९)

इन्द्रियदोषात्संस्कारदोषाच्चाविद्या।। – वै० अ० १ । आ० २ । सू० १० ।।

दोहा

इन्द्रिय अरु संस्कार का, होवहि दोष महान।

होय अविद्या उत्पति, यह दूषित अज्ञान।

तद्दुष्टं ज्ञानम्।।      – वै० अ० १ । आ० २ । सू० ११ ।।

अदुष्टं विद्या।। – वै० अ० १ । आ० २ । सू० १२ ।।

पृथिव्यादिरूपरसगन्धस्पर्शा द्रव्यानित्यत्वादनित्याश्च।।

एतेन नित्येषु नित्यत्वमुक्तम्।। – वै० अ० ७ । आ० १। सू० २-३।।

चौपाई

विद्या नाम यथारथ ज्ञाना,

या ते होय सत्य को भाना।

भूम्यादिक जे कार्य पदारथ,

सब अनित्य नहीं नित्य यथारथ।

रूपादिक गुण इनके जेते,

हैं अनित्य सब के सब तेते।

पृथिवी जल जे कारण रूपा,

तिनके गुण हैं नित्य स्वरूपा।

सदकारणवन्नित्यम्।। – वै० अ० ४ । आ० १ । सू० १ ।।

विद्यमान जो हैं बिन कारण,

नित्य पदारथ जान साधारण।

कारण सहित कार्य गुण रूपा,

तिनका होय अनित्य स्वरूपा।

अस्येदं कार्यं कारणं संयोगि विरोधि समवायि चेति लैङिगकम्।। – वै० अ० १ । आ० २ । सू० १ ।।

चार खानि लैंगिक विज्ञाना,

लिंग लिंगी सम्बन्ध सुजाना।

समवायि, समवायि एकारथ,

इनते होवे ज्ञान यथारथ।

है तृतीय लैंगिक संयोगी,

चौथा जानहु लिंग विरोधी।

है परिमाण युक्त आकासा,

यह समवायी लिंग प्रकासा।

यह शरीर है नित त्वक् वाला,

त्वक् बिन पिंड न देखाभाला।

त्वचा देह का नित संयोगा,

त्वचा देह के हैं सब भोगा।

जानहु एकारथ समवायी,

अर्थ दोय इक मांहि समायी।

‘छूना’ कारज रूप निहारा,

कारज लिंग जानने वारा।

चतुरथ लिंग विरोधी कहिये,

विरुद्ध लिंग सों सत को गहिये।

वर्षा भई हमने यह जानी,

अब नहीं होगी पुन यह मानी।

याको भाषहिं लिंग विरोधी,

जानहिं सो जो आतम बोधी।

नियतधर्मसाहित्यमुभयोरेकतरस्य वा व्याप्तिः।।

निजशक्त्युद्भवमित्याचार्याः।।

आधेयशक्तियोग इति प९चशिखः।। – सांख्यशास्त्र २९, ३१, ३२।।

साधन साध्य नियत सहचारा,

‘व्याप्ति’ नाम ताको निर्धारा।

साहचर्य अथवा साधन का,

निश्चित होय न संशय मन का।

यथा धूम अग्नि सहचारी,

जानत हैं सब नर अरु नारी।

व्याप्य धूम जो करे पसारा,

अग्नि उत्पति करने हारा।

दूर देश पहुंचा जब धूमा,

रूम झूम अग्नि बिन धूमा।

‘व्याप्ति’ कहें याको विद्वाना,

रूप अग्नि के हैं यह जाना।

अग्नि का बल मारन भेदन,

जारण छारन द्रव्यहिं छेदन।

निज समरथ से अग्नि जलावे,

जल को धूम रूप प्रगटावे।

महत्तत्व में प्रकृति व्यापहि,

व्याप्य होए बुद्धि में आपहि।

वल आधेय अरु बली आधारा,

व्यापक व्याप्त सम्बन्ध विचारा।

याको व्याप्ति नाम बखाने,

व्यापक व्याप्य धर्म पहिचाने।

इस विध प्रथमहि करे परीक्षा,

सांच झूठ की होय समीक्षा।

जो जो ग्रन्ाि सत्य परमाना,

तिनको पढ़ना और पढ़ाना।

बिन परखे जो पढ़े पढ़ावें,

आयु निरर्थक मूर्ख गंवावें।

लक्षणप्रमाणाभ्याम् वस्तुसिद्धिः

बिन लक्षण अरु बिन परमाना,

सत्यासत्य ना जाए जाना।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)