०४० स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (१८)

तृतीय समुल्लास भाग (१८)

अणुमहदिति तस्मिन्विशेषभावाद्विशेषाभावाच्च।। – वै० अ० ७ । आ० १ । सू० ११।।

बड़ा ‘महत्’ ‘अणु’ सूक्ष्म जाने,

अणु महत् का भेद पछाने।

जिमि त्रिसरेणु लीख सों छोटा,

होय परन्तु द्वयगुण सों मोटा।

छोटे हों पृथिवी से जैसे,

पर महान वृक्षों से तैसे।

सदिति यतो द्रव्यगुणकर्मसु सा सत्ता।। – वै० अ० १ । आ० २ । सू० ७।।

द्रव्य गणन कर्मन के संगा,

लगा रहे ‘सत’ शब्द अभंगा।

उसको ‘सत्ता’ कहें सुजाना,

‘सता’ वर्तमान करि माना।

यथा द्रव्य ‘सत’ सत गुण कर्मा,

‘सत्ता’ वर्तमान को धर्मा।

भावोऽनुवृत्तेरेवे हेतुत्वात्सामान्यमेव।। – वे०अ० १ । आ० २ । सू० ४।।

सकल संग सत्ता को भावा,

वही महा सामान्य कहावा।

दोहा

प्रागभाग प्रध्वांस अरु, अन्योअन्य अभाव।

पुन सम्बन्ध अत्यन्त यह, पंच अभाव कहाव।

चौपाई

इन पंचन के कहिहौं लक्षण,

जिमि कणाद मुनि कहे विलक्षण।

क्रियागुणव्यपदेशाभावात्प्रागसत्।। – वै० अ० १। आ० १। सू० १।।

उत्पति सों पूरव नहीं भावा,

याकी संज्ञा प्राग अभावा।

उत्पति पूरव कहीं न घट था,

प्राक् बुनन ते रहा न पट था।

उत्पन होय बहुरि बिनसावे,

यह प्रध्वंस अभाव कहावे।

यथा घड़ा वन कर के टूटा,

भया अभाव भाव सों छूटा।

अन्य भाव नहीं अन्य स्थाने,

यह अन्योन्याभाव पछाने।

यह घोड़ा है गैया नाहीं,

गोत्व भाव नहीं घोड़े माँही।

असम्भाव्य अत्यन्ताभावा,

जिमि बंध्या सुत नहीं उपजावा।

नर शिर शृंग गगन नहीं फूले,

उपजे पेड़ नहीं बिन मूले।

है अभाव अन्तिम संसर्गा,

यह अभाव के पाँचहु वर्गा।

जिमि घट घर के भीतर नाहीं,

है अर्थात् अन्य कोऊ ठाहीं।

घर घर कर सम्बन्ध न कोई,

है अभाव संसर्गज सोई।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)