०३९ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (१७)

तृतीय समुल्लास भाग (१७)

कर्म

उत्क्षेपणमवक्षेपणमाकु९चनं प्रसारणं गमनमिति कर्माणि।। – वै० अ० १ । आ० १ । सू० ७।।

चौपाई

उत्क्षेपण है उठना ऊपर,

अवक्षेप गिर जाना भू पर।

‘आकुच्चन’ संकोचहिं कहिये,

अर्थ फैलाव ‘प्रसारण’ गहिये।

गमन नाम है आना जाना,

कर्म गति यह कर्म विधाना।

एकद्रव्यमगुणं संयोगविभागेष्वनपेक्षकारणमिति कर्मलक्षणम्।। – वै० अ० १ । आ० १ । सू० १७।।

कर्म रहे नित द्रव्य सहारे,

गुण से रहित कर्म हैं सारे।

निरपेक्ष संयोग विभागे,

सदा रहें द्रव्यन से लागे।

द्रव्यगुणकर्मणां द्रव्यं कारणं सामान्यम्। – वै० अ० १ । आ० १। सू० १८।।

द्रव्य कर्म अरु गुण का कारण,

जो है द्रव्य सो द्रव्य साधारण।

द्रव्याणां द्रव्यं कार्य्यं सामान्यम्।। – वे० अ० १। आ० १। सू० २३।।

द्रव्य द्रव्य का कार्य्य जो माना,

कार्य्य रूप वह द्रव्य समाना।

द्रव्यत्वं गुणत्वं कर्मत्व९च सामान्यानि विशेषाश्च।। – वै. अ. १ । आ० २ । सू० ५।।

द्रव्यों में द्रव्यत्व निवासा,

कर्म माँहि कर्मत्व विलासा।

गुण में गुणता रखे प्रवेशा,

या को नाम ‘सामान्य विशेषा’।

गुण महँ गुणता है साधारण,

करि विशेष द्रव्यत्वहिं धारण।

सामान्यं विशेष इति बुद्धयपेक्षम्।। – वै० अ० १ । आ० २ । सू० ३।।

बुद्धिगत सामान्य बिशेषा,

इसमें नहीं संशय को लेषा।

नर में नरता यथा समाना,

पशुपन सों सविशेषहि जाना।

इहेदमिति यतः कार्यकारणयोः स समवायः।। – वै० अ० ७ । आ० २ । सू० २६।।

नित सम्बन्धी कारज कारण,

यह सम्बन्ध न होय निवारण।

तैसे क्रिया क्रिया का कारक,

समवायी सम्बन्ध के धारक।

अपर द्रव्य सम्बन्ध संयोगा,

वाको होवहि अवस वियोगा।

द्रव्यगुणयोः सजातीयारम्भकत्वं साधर्म्यम्।। – वे० अ० १ । आ० १। सू० ९।।

द्रव्य और गुण को यही विधाना,

कारज करहिं आरंभ समाना।      

शास्त्र कहें याको साधर्म्या,

विरुध धर्म होवे वैधर्म्या।

जैसे जड़ता पृथिवी माँही,

घट में भी चेतनता नाहीं।

कारज घट कारण अनुकूला,

सदृश गुण हों नहीं प्रतिकूला।

विरुध धर्म वैधर्म्य कहावे,

दोनों मँह समता नहीं आवे।

यथा भूमि मँह है कठिनाई,

सूखापन अरु गंधि सवाई।

जल में रहती कोमलताई,

द्रवता रसता अंग रमाई।

यही धर्म वैधर्म्य कहावे,

सम सदृशता मिल नहीं पावे।

कारणभावात्कार्यभावः।। – वै० अ० ४ ं आ० १ । सू० ३ ।।

न तु कार्याभावात्कारणाभावः।। – वै० अ० १। आ० २ । सू० २।।

बिन कारण नहीं कारज सम्भव,

जनक बिना सुत जन्म असम्भव।

बिना कार्य कारण को पेखें,

सुत बिन पिता जगत में देखें।

कारणगुणपूर्वकः कार्यगुणा दृष्टः।। – वे० अ० २ । आ० १ । सू० २४ ।।

जो गुण कारण माँह विराजें,

वैसे ही गुण कारज में छाजें।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)