०३५ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (१३)

तृतीय समुल्लास भाग (१३)

आचार की महिमा

आचारः प्रथमो धर्मः श्रुत्युक्तः स्मार्त्त एव च।

तस्मादस्मिन्त्सदा युक्तो नित्यं स्यादात्मवान् द्विजः।।१।।

आचाराद्विच्युतो विप्रो न वेदफलमश्नुते।

आचारेण तु संयुक्तः सम्पूर्णफलभाग्भवेत्।।२।। – मनु० १। १०८-१०९

कथन श्रवण का यह फल जानो,

धर्म शास्त्र प्रतिपादित मानो।

वही आचार जो वेद बखाने,

जाको स्मृतियाँ गातीं गाने।

ताँते चलहु धर्म अनुकूला,

धर्म जगत में सुख कर मूला।

पतिताचार न सुख को पावे,

निष्फल वाकी विद्या जावे।

श्लोक

योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद् द्विजः।

स साधुभिर्बहिष्कार्यों नास्तिको वेदनिन्दकः।।१।। – मनु० २ । ११

चौपाई

वेद शास्त्र जो करि अपमाना,

करे चरे अपने मन माना।

वह निंदक नास्तिक अति भारा,

उसे जाति से कीजिये न्यारा।

एंगत वीच न बैठन दीजे,

नगर देशसों बाहर कीजे।

धर्म का लक्षण

श्रुतिः स्मृति सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।

एतच्चतुर्विध्र प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम्।।१।। – मनु० २ । १२

वेद विहित स्मृति कथित आचरणा, भद्रलोक जिन्ह मग धरु चरणा।

जो मन को अथ लागे प्यारा, लक्षण यही धर्म के चारा।

सत्य गहे मिथ्या परित्यागे, जन्म जन्म तस पाप न लागे।

            अर्थकामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते।

            धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः।। – मनु० २ । १३

चौपाई

जिसने मन से माया त्यागी,

काम कला से भला विरागी।

पावे वही धर्म को ज्ञाना,

दया दृष्टि राखें भगवाना।

जाके होय धर्म जिज्ञासा,

वेद मिटाएँ वाकी प्यासा।

वेदहि संशय सकल मिटावें,

धर्म वेद निर्णय करवावें।

नरपति का यह कर्म प्रधाना,

सब जातिन दे विद्या दाना।

ब्राह्मण क्षत्रिय सबहिं पढ़ावें,

शुद्रहु उत्तम विद्या पावे।

विद्या हीन रहे नहीं कोऊ,

विद्या लोक सुधारे दोऊ।

पठित होयं यदि ब्राह्मण सारे,

शेष वर्ग हों अपढ़ बेचारे।

नहीं राज्य की होवे वृद्धि,

धन संपत्ति की क्यों कर सिद्धि।

उच्छृखङल ब्राह्मण विद्वाना,

छल पाखंड करेंगे नाना।

फैले पाप पुण्य दिव्य जाई,

धर्म लुप्त सत्कर्म नशाई।

तीन वर्ग विप्रन अनुसरिहैं,

स्वेच्छाचार सकल नर करिहैं।

वेद छाँड़ ब्राह्मण की बानी,

नियम बने हो देश की हानि।

चतुर्वर्ण जब विद्या पावें,

मनमानी पुन कौन रचावें।

सभी पठित सब होंगे चातर,

हो निर्मल दंभ तरु पातर।

विप्रहु चहै जो निज कल्याना,

सब वर्गन दे विद्या दाना।

क्षत्रिय राज्य बढ़ाने हारे,

क्षत्रिय देश बचाने वारे।

क्षत्रिय के चहे प्राण निकारें,

अन्न हेतु नहीं हाथ पसारें।

पक्षपात नहीं राखें रंचक,

न्यायशील क्यों होंवे वंचक।

विप्र रखें क्षत्रिय पर अंकुश,

ब्राह्मण भी नहीं होंय निरंकुश।

क्षत्रिय करें विप्र पर शासन,

दोनों का सम ऊँचा आसन।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)