०३४ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (१२)

तृतीय समुल्लास भाग (१२)

आचार्य का शिष्य का उपदेश

वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति। सतयं वद। धर्म चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः। आचार्य्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः। सत्यान्न प्रमदितव्यम्। धर्मान्न प्रमदितव्यम्। कुशलान्न प्रमदितव्यम्। भूत्यै न प्रमदितव्यम्। स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्।।१।।

देवपितृकाय्या्रभ्यां न प्रमदितव्यम्। मातृदेवो भव। पितृदेवो भय।। आचार्य्यदेवो भय। अतिथिदेवो भव। यान्यस्काम सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि।।२।। नो इतराणि। ये के चास्मच्छ्रेयांसो ब्राह्मणास्तेषां त्वयासनेन प्रश्वसितव्यम्। श्रद्धया देयम्। अश्रद्धया देयम्। श्रिया देयम्। हित्रया देयम्। भिया देयम्। संविदा देयम्। अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात्।।३।।

ये तत्र ब्राह्मणाः समदर्शिनो युक्ता अयुक्ता अलूक्षा धर्मकामाः स्युर्यथा ते तत्र वर्त्तेरन्। तथा तत्र वर्त्तेथाः। (अथाभ्याख्यातेषु। ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः। युक्ता आयुक्ताः। अलूक्षा धर्मकामाः स्युः। यथा ते तेषु वर्त्तेरन्। तथा तेषु वर्त्तेथाः।।) एष आदेश एष उपदेश एषा वेदोपनिषत्। एतदनुशासनम्।   एवमुपासितव्यम्। एवमु चैतदुपास्यम्।।४।। – तैत्तिरीय० प्रपा० ७ । अनु० ११ । कं० १ । २ । ३ । ४

सुनहु तात अब देकर काना,

दत्तचित्त सावध धरि ध्याना।

सत्य बोल अरु धर्महु आचर,

बिन प्रमाद पढ़ विद्या प्रियवर।।

पूरन ब्रह्मचर्य को धारहु,

गुरु को प्रिय धन से सत्कारहु।

करि विवाह सन्तति उत्पादन,

भूलेहु झठ न कर प्रतिपादन।

कर प्रमाद धन से मत भागे,

आलस सों धर्महु नहीं त्यागे।

स्वास्थ्य निरोग न तज चतुराई,

विद्या पढ़ चित ध्यान लगाई।

मात पिता गुरु अरु विद्वाना,

सदा करें इनका सन्माना।

सत्याचरण शास्त्र अभिविन्दित,

धर्म कर्म कर सदा अनिंदित।

शुभ गुण करियो ब्रहण हमारे,

दुर्गुण हमरे गहो न प्यारे।

सद् ब्राह्मण की कर सत्संगति,

दुर्जन की मत बैठ कुसंगति।

हो कल्याण जो देवे दाना,

दान करे तज कर अभिमाना।

श्रद्धा और अश्रद्धा होवे,

फल हित दान बीज किन बोवे।

शोभा लज्जा भय से देवे,

बिन बीजे फल कैसे लेवे।

कबहुं होय धर्म पर संसा,

डोल जाय जो मन की मंसा।

करिये वही शील अचारा,

धर्मातम जन के अनुसारा।

यही वेद है यही उपदेशा,

यही मोर आज्ञा सन्देशा।

यह शिक्षा निज मन मँह धारो,

इस पर चल निज चलन सुधारो।

या विधि गुरु शिष्यहिं उपदेशे,

धर्म पंथ में तिनहिं प्रवेशे।

अकामस्य क्रिया काचिद् दृश्यते नेह कर्हिचित्।

यद्यद्धि कुरुते कि९िचत् तत्तत्कामस्य चेष्टितम्।। – मनु० २ । ४

जो जन कहें ीालो नहीं कामा,

समुचित है जीवन निष्कामा।

वे प्राणी हैं भूले भ्रम के,

बिना कामना पलक न झमके।

सोच समझ देखो संसारा,

बिन काम नहीं कोऊ व्यापारा।

कामहि जग के काज चलावे,

काम बिना जग गति रुक जावे।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)