०३३ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (११)

तृतीय समुल्लास भाग (११)

श्लोक

संमानाद् ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव।

अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा। – मनु० २ । १६२

चौपाई

ब्राह्मण वही वेद का ज्ञाता,

साक्षात् वह प्रभु को पाता।

वही समय का जानन वाला,

जो स्तुति जाने विष का प्याला।।

निंदा को अमृत करि जाने,

जग उसको सद् ब्राह्मण माने।

श्लोक

अनेन क्रमयोगेन संस्कृतात्मा द्विजः शनैः।

गुरौ वसन् सँचिनुयाद् ब्रह्माधिगमिकं तपः।।

योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्।

स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः।। – मनु० २ । १६४-१६८

चौपाई

संस्कृतात्मा द्विज ब्रह्मचारी,

कृत उपनयन कुमार कुमारी।

वेद ज्ञान तप धीरे धीरे,

उन्नति करें गुरु के नीरे।

विप्र होय जो पढ़े न वेदा,

विप्र शूद्र में नहीं कोई भेदा।

ब्राह्मणपन को लाज लगाए,

वंश सहित शूदर गति पाए।

ब्रह्मचारी के धर्म

            वर्जयेन्मधुमांस९च गन्धं माल्यं रसान् स्त्रियः।

शुक्तानि यानि सर्वाणि प्राणिनां चैव हिंसनम्।।१।।

अभ्यङग्म९जनं चाक्ष्णोरुपानच्छत्रधारणम्।

कामं क्रोधं च लोभं च नर्त्तनं गीतवादनम्।।२।।

द्यूतं च जनवादं च परिवादं तथानृतम्।

स्त्रीणां च प्रेक्षणालम्भमुपघातं परस्य च।।३।।

एकः शयीत सर्वत्र न रेतः स्कन्दयेत्क्वचित्।

कामाद्धि स्कन्दयन् रेतो हिनस्ति व्रतमात्मनः।।४।। – मनु० २ । १७७-१८०

ब्रह्मचारी नर हों वा नारी,

सदा रहें सब शुद्धाचारी।

मद्य मांस गन्धि और माला,

कबहूं करे न दर्शन बाला।

नारी पुरुष करें नहीं संगा,

अ९जन जूते मद्रन अंगा।

हिंसा द्वेष नृत्य अरु गाना,

गुप्तेन्द्रिय को हाथ लगाना। 

सब प्रकार की तजे खटाई,

काम क्रोध मद मोह नशाई।

जन-जन की निंदा अरु चर्चा,

मिथ्या वचन कुमर्म कुचर्चा।

ब्रह्मचारी नित सोये अकेला,

काम केरि खेले नहिं खेला।

जो नर करे वीर्य की स्खलना,

निज आतम सों करता छलना।

पतित होय मूरख ब्रत नारी,

रूठ जाँय आतम अविनाशी।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)