०३० स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (८)

तृतीय समुल्लास भाग (८)

चतस्त्रोऽवस्थाः शरीरस्य वृद्धियौंवनं सम्पूर्णंता कि९िचत् परिहाणिश्चेति। आषोडशादृद्धिः। आपश्चविंशतेयौंवनम्। आचत्वारिंशतः सम्पूर्णता।

ततः कि९िचत् परिहाणिश्चेति। प९चविंशे ततो वर्षे पुमान् नारी तु षोडशे।

समत्वागतवीर्यौ तौ जानीयात्कुशलो भिषक्।। – सुश्रुत सूत्र० अ० ३५

चार अवस्था हैं नर तन की,

वृद्धि यौवन पूरनपन की।

पुन किंचित् परिहाणि आवे,

इस आयु में विवाह करावे।

सोलह से पच्चीस तक वृद्धि,

चालिस तक यौवन की सिद्धि।

हष्ट पुष्ट तब होवें अंगा,

पूरणता की उठें तरंगा।

बढ़ते धातु ठौर न पावें,

स्वेदादि संग बहिर आवें।

सर्वोत्तम अठतालिस वर्षे,

पाणि गह नर तन मन हर्षे।

नियम भेद नारी के जाने,

नर नारी नहीं एक समाने।

नर पचीस तो सोलह नारी,

ब्रह्मचर्य रख रहे कँवारी।

सत्रह तीस अठारह छती,

नर नारी सम न्यून न रत्ती।

नर होवे चालीस सपूरन,

बीस वर्ष में कन्या पूरन।

अठतालिस की आयु में नर,

करे विवाह सु जानहु वर तर।

ब्रह्मचर्य आगे मत धारे,

कर विवाह सन्तान प्रसारे।

जीवन भर रहना ब्रह्मचारी,

महा कठिन अति दुष्कर भारी।

इन्द्रिय जित पूरन विद्वाना,

योगी जन का कर्म महाना।

काम महानद प्रबल प्रवाहा,

अगम गभीर अपार अथाहा।

नद का नीर तीर जिमि फोड़े,

काम बाढ़ संयम तट तोड़े।

बिना योग नैष्ठिक ब्रह्मचारी,

मानहु इक भूकम्पन भारी।

अति तीक्ष्ण काँटों की शय्या,

भीष्म सरिस कोउ बिरला भैया।

अठतालिस पर विवाह रचावे,

चार पदारथ सहजहि पावे।

अथ पढ़ने-पढ़ाने वालों के नियम

ऋंत च स्वाध्यायप्रवचने च। सत्यं च सवाध्यायप्रवचने च। तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च। दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। अगन्यश्च स्वाध्यायप्रवचने च। अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च। अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च। मानुषं च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च। – तैत्तिरीय उ० ७ । १

सदाचार अरु सद्विद्याएं,

वेद शास्त्र सब पढ़े पढ़ाएँ।

पढ़े वेद अरु रहे तपस्वी,

इन्द्रिय वश कर रहे मनस्वी।

निर्मल वृत्ति रखे सुजाना,

अग्नि अरु विद्युत कर ज्ञाना।

अग्नि होत्र दोउ काल रचावे,

दत्त चित्त हो पढ़े पढ़ावे।

भूले नहीं अतिथि की सेवा,

कहें अतिथि को शास्तर देवा।

मनुषोचित करते व्यवहारा,

पढ़े पढ़ाये जीवन सारा।

सन्तति शिष्य राज्य कर पालन,

पाठन पठन रखे नित चालन।

करत वीर्य रक्षा और वृद्धि,

पढ़े पढ़ाएँ पाएँ सिद्धि।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)