०२९ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (७)

तृतीय समुल्लास भाग (७)

श्लोक

ब्राह्मणस्त्रयाणां वर्णानामुपनयनं कर्त्तुमर्हति।

राजन्यो द्वयस्य।

वैश्यो वैश्यस्यैवेति।

शूद्रमपि कुलगुणसम्पन्न मन्त्रवर्जमनुपनीतमध्यापयेदित्येके।।

चौपाई

यज्ञसूत्र ब्राह्मण पहरावे,

त्रय वण्रन उपनयन करावे।

शूद्र होय शुभ लक्षण वंशा,

बढ़े जो होवे बुद्धि अवतंसा।

मन्त्र संहिता त्याग पढ़ाना,

शेष सपूरन शास्त्र बताना।  

शूद्र पठन का है अधिकारी,

पर नहीं होवहिं सूतरधारी।

मानहिं ऐसा अनिक अचारज,

पूर्व काल के ब्राह्मण आरज।

बाल बालिका विद्या पारन,

बहुरि जाँय निज निज चटसारन।

अंगन और उपांग समेता,

पढ़ें वेद त्रय ऊरध रेता।

छत्तिस वर्ष व्यतीत निरापद,

विद्या पूनरन करें समापत।

अष्टादश अथवा नव वर्षा,

विद्या पूरन करें सहर्षा।

ज्ञान सपूरन करहिं न जब लौं,

ब्रह्मचर्य को सेवहिं तब लौं।

श्लोक

षट्त्रिंशदाब्दिकं चर्य्यं गुरौ त्रैवैदिकं व्रतम्। तदर्धिकं पादिकं वा ब्रहणान्तिकमेव वा।।मनु० ३ । १

पुरुषो वाब यज्ञस्तस्य यानि चतुर्विशति वर्षाणि तत्प्रातःसवनं चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री गायत्रं प्रातःसवनं तदस्य वसवोऽन्वायत्ताः प्राणा वाव वसव एते हीद सर्वं वासयन्ति।। १ ।।

त९चेदेतस्मिन् वयसि कि९िचदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा वसव इदं मे प्रातःसवनं माध्यन्दिन सवनमनुसंतनुतेति माहं प्राणानां वसूनां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युभ्दैव तत एत्यगदो ह भवति।।२।।

अथ यानि चतुश्चत्वारिशद्वर्षाणि तन्माध्यन्दिन सवं चतुश्चत्वारिशदक्षरा त्रिष्टुप् त्रैष्टुभं माध्यंदिनसवनं तदस्य रुद्रा अन्वायत्ताः प्राणा वाव रुद्रा एते हीदसर्वरोदयन्ति।। ३ ।।

तं चेदेतस्मिन्वयसि कि९िचदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा रुद्रा इदं मे माध्यन्दिन सवनं तृतीयसवनमनुसन्तनुतेति माहं प्राणाना रुद्राणां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युभ्दैव तत एत्यगदो ह भवति।।४।।

अथ यान्यष्टाचत्वारि शद्वर्षाणि तत्तृतीयसवनमष्आचत्वारि शदक्षरा जगती जागतं तृतीयसवनं तदस्यादित्या अन्वायत्ताः प्राणा वावादित्या एते हीदसर्वमाददते।। ५ ।।

तं चेदेतस्मिन् वयसि कि९िचदुपतपेत्स ब्रूयात् प्राणा आदितया इदं मे तृतीयसवनमायुरनुसंतनूतेति माहं प्राणानामादित्यानां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्सुद्धैव तत एत्यगदो हैव भवति।।६।।  – छान्दोग्य०

चौपाई

ब्रह्मचर्य के तीन प्रकारा,

उत्तम मध्य कनिष्ठ विचारा।

तनु अरु तन में रहने हारा,

यज्ञ रूप सद्गुण आधारा।

इन्द्रिय जित रह चौबि वर्षा,

वैद शास्त्र करि ज्ञान विमर्षा।

विद्या तप से आत्म तपावे,

हो बलवन्त विवाह करावे।

कबहुं न होवे लंपट भोगी,

गृह आश्रम मह मानहु योगी।

ब्रह्मचारी राखे विश्वासा,

ब्रह्मचर्य में जीवन आसा।

ब्रह्मचर्य जो रखूं अखंडित,

जीवन हो बल बुद्धि मण्डित।

जीवन सों जग करहिं सचेता,

रे प्राणि रह ऊरध रेता।

ब्रह्मचर्य सब सुक्खागारा,

ब्रह्मचर्य बल बुद्धि अधारा

ब्रह्मचर्य यश सम्पति गेहा,

रहे निरोग निरन्तर देहा।

मो सम ब्रह्मचर्य तुम सेवहु,

असी वर्ष लौं आयु लेवहु।

इन्द्रिय जित रहे वर्ष चवाली,

मध्यम ब्रह्मचर्य प्रणपाली।

रुद्र रूप वह अति बलवन्ता,

दुर्जन दुष्ट जनों का हन्ता।

वर्ष चार शत आयु पावे,

वाके मृत्यु निकट नहीं आवे।

करतल वाके चार पदारथ,

मानस जीवन सफल सकारथ।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)