०२८ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (६)

तृतीय समुल्लास भाग (६)

प्रश्न

होम किये ते क्या फल होवे,

धृत सामग्री व्यर्थ न खोवे।

चन्दन चर्चे फूल चढ़ावे,

प्राणिन को घृत अन्न खिलावे।

इससे होवे पर उपकारा,

अगन ढार क्यों करिये छारा।

केसर चन्दन गृह में धरिये,

गृह को सुमन सुवासित करिये।

उत्तर

दुर्गन्धि से उपजें रोगा,

पवन सुवासित सुख संजोगा।

जल कर अग्नि माँहि पदारथ,

नाश न होवे द्रव्य यथारथ।

दूर देश थित नर की नासा,

अनुभव करती वास सुवासा।

पवन उड़ा कर गन्धि ले जावे,

वायु मण्डल मँह फैलावे।

जल कर द्रव्य होंय अति हलके,

क्षय कारक वायु के मल के।

भस्म हुए बिन रहते भारी,

दूर देश हित नहीं हितकारी।

घर का वायु बाहिर न लावें,

बिना जरे कँह समरथ पावें।

अगन माँहि है शक्ति भेदन,

दुर्गन्धित वस्तु करि छेदन।

सूक्षम कर तिंहि बहिर आवे,

शुद्ध पवन को भीतर लावे।

जो घृत अन्न खिलावें रंका,

लघु उपकार तनिक नहीं शंका।

सामग्री वरु होम जलाई,

लाखों जन की करें भलाई।

हवन करे बरसे शुभ वारिद,

हरे होम व्याधि दुख दारिद।

जिज्ञासु

हवन प्रयोजन मलहिं निवारण,

पुन मन्त्रन केहि हेतु उचारण।

बिना होम क्या होवे दूषण,

शाप देयं क्या जल और पूषण।

कितनी डालें नित्य आहुति,

जिन ते हो जल वायु पुती।

आहूती का क्या परिमाना,

शास्त्रन में केहि भाँति विधाना।

समीक्षक

सुनहु वत्स मन्त्रन का गाना,

हवन यज्ञ का लाभ बखाना।

वेद मंत्र कण्ठागर होवें,

जग में वेद उजागर होवें।

मल पुद्गल नर मल उपजावे,

रोम रोम से मल फैलावे।

मानस तन दुर्गन्धि अधारा,

जल वायु मँह करे विकारा।

यह नर रोग व्याधि का कारण,

ताँते मल का करहिं निवारण।

जो नहीं हवन करहि नर नारी,

पाप दण्ड पावन अधिकारी।

सोलह सोलह आहुति देवे,

छः छः मासा घृत संग लेवे।

न्यून करे होवे फल हानी,

होमहि अधिक अधिक फल जानी।

दोहा

राजा राजर्षि अरु मुनि, करते यज्ञ महान।

रोग शोक जग का हरें, पावहिं पद कल्यान।

चौपाई

घर घर था जब हवन प्रचारा,

रोग शोक सों भारत न्यारा।

बाल मृत्यु नहीं मृत्यु अकाला,

चिंरजीव आयु शत साला।  

हष्ट पुष्ट सुन्दर बलवन्ता,

आर्यवर्त वासी श्रीमन्ता।

यह दो वैदिक यज्ञ सनानत,

अति उपयोगी परम पुरातन।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)