०२६ स. प्र. कवितामृत द्वितीय समुल्लास (६)

द्वितीय समुल्लासः भाग (6)

चौपाई

सदा सत्य का करे प्रकाशा,

तजे पखण्डिन का विश्वासा।

गुरु बतलावें जो शुभ कर्मा,

वही कर्म साधन हित धर्मा।

कण्ठ करावें दर्शन वेदा,

अर्थ सहित सब जाने भेदा।

यास्क पंतजलि पाणिनि ग्रन्थन,

ऋषि प्रणीत ग्रन्थों का मंथन।

समुल्लास पहले अनुसारा,

ईश्वर माने जगदाधारा।

बल विद्या आरोग्य बढ़ावन,

भोजन छादन कर मन भावन।

पूर पेट भोजन मत खावे,

मद्य माँस के निकट न जावे।

गहन जलाशय जल गंभीरे,

बिन जाने पैठे मत नीरे।

दोहा

गहरे जल पैठे नहीं, जब तक होय न ज्ञान।

डूबे जल जन्तु भखें, कहें मनु भगवान।।

सँभल सँभल पग धर मग मीता,

वस्त्र छान जल पिये पुनीता।।

सत्य पुनीता वाणी बोले,

कर्म करे मन पहले तोले।

श्लोक

दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।

सत्यपूतां वदेद्वाचं मनः पूतं समाचरेत्।। – मनु० ६ । ४६

चौपाई

सन्तानहिं विद्या न पढ़ावें,

सन्तति के वे शत्रु कहावें।

ज्ञान हीन नर मूढ़ समाना,

सभा माँहि पावे अपमाना।

हँसों में बक सोहे नाहीं,

मूरख नर त्यों पण्डित माँहीं।

श्लोक

माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।

सभामध्ये न शोभन्ते, हंसमध्ये बको यथा।। – चाणक्यनीति अ० २२ श्लोक ११

चौपाई

मात-पिता जो कीरति चाहें,

तो बालक को योग्य बनावें।

तन मन धन सब शक्ति लगावें,

कीरति अटल जगत मह पावें।

इति श्री आर्य महाकवि जयगोपाल विरचिते सत्यार्थ प्रकाश कवितामृते द्वितीयः समुल्लासः समाप्तः।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)