०२५ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (३)

तृतीय समुल्लास भाग (३)

जो सत चित आनन्द सरूपा,

बड़ समरथ भूपन को भूपा।

शुद्ध बुद्ध नित मुक्त स्वभावा,

दयावन्त असु मूरति न्यावा।

जन्म मरण का कष्ट न पावे,

निराकार घट माँहि समावे।

कर्त्ता धर्त्ता पालन हारा,

ईश्वर जगत रचाया सारा।

शुद्ध रूप सुन्दर कमनीया,

रोम रोम में है रमनीया।

रे नर उस प्रभु का धर प्रयाना,

जाते मूढ होय मतिमाना।

मन के अन्दर मन का स्वामी,

मन की जाने अन्तर्यामी।

जेहि छिन दया दृष्टि तिस होवे,

मलिन मति को मति वह धोवे।

कुपथ हटाय सुपन्थ चलावे, सदा

सत्य का मार्ग दिखावे।

अभ्दिर्गात्रााणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति।

विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति।। – मनु० अ० ५ । श्लो० १०२

स्नान करे नित उठ कर प्राता,

जल से शुद्ध होंय सब गाता।

सत्य वचन से मन की शुद्धि,

ज्ञान भये पावन हो बुद्धि।

विद्या तप का परम महातम,

शुद्ध होय इनसे जीवातम।

भूमि से ईश्वर पर्यन्ता,

अगणित द्रव्य पदार्थ अनन्ता।

बिन विवेक कछु समझ न लावे,

ज्ञानवान निश्चय कर पावे।

दोहा

ज्ञान बढ़ावे मल नशै, जानहु एक उपाय।  

दलन दोष मल जरण कर, प्राणायाम सहाय।।

प्राणायामादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।। – योग साधन पादे स० २८

चौपाई

ज्यों ज्यों नर करि प्राणायामा,

शुद्ध होय मन इन्द्रिय ग्रामा।

अन्तःकरण ज्ञान परगासा,

अन्धकार का होय विनासा।

अन्त काल मुक्ति पद पावे,

जन्म मरण बन्धन नहीं आवे।

अगन माँहि जिमि तपे सुवर्णा,

कुन्दन हो दमके शुभ वर्णा।

तैसेऊ प्राणायाम जलावे,

इन्द्रिय गत सब दोष हटावे।

श्लोक

दह्यन्ते घ्मायमानानां धातूनां च यथा मलाः।

तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात्।। – मनु० ६ । ७१

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)