०२४ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (२)

तृतीय समुल्लास भाग (२)

दोहा

गुरु जननी गुरु जनक अब, गुरु का धाम स्वधाम।

मात पिता नहीं मिल सकें, गुरुकुल में विश्राम।।

चौपाई

गुरु अर्पण कीनी सन्ताना,

बहुरि न उनको मिले सुजाना।

कबहुं न भेजे चिट्ठी पाती,

छूटी ममता पुन नहीं आती।

मिटे सकल चिन्ता संसारी,

छात्र पढ़ें गुरु के अनुहारी।  

भ्रमण हेतु जाएँ विद्यारथि,

गुरु महाराज रहें तिन सारथि।

करन न पावें कोऊ कुचालें,

गुरु जन उन को सदा सम्हालें।    

हितकर बालक गुरु गृह वासन,

मानव धर्म शास्त्र अनुशासन।

जाति नियम अथ हो नृप धर्मा,

वटुकहुँ रखे न कोउ निज घर मा।

पठन काज जो पठे न बाला,

कठिन दण्ड देवे भूपाला।

श्लोक

कन्यानां सम्प्रदानं च कुमाराणां च रक्षणम्।। – मनु० अ० ७ । श्लोक १५२

दोहा

मात पिता और गुरु का, प्रथम धर्म यह जान।

सार्थ गायत्री मंत्र का, शिशुहिं करावे भान।।

ओ३म् भूर्भवः स्वः। तर्त्सवितुर्वरैण्यं भर्गों देवस्यं धीमहि।

धियो यो नः प्रचोद्यात्।। – यजु० अ० ३६।। मं० ३।।

सोरठा

‘ओ३म्’ शब्द व्याख्यान, प्रथम समुल्लासे किया।

वही अर्थ परमान, सब शास्त्रन में सिद्ध है।

सोरठा

महा व्याहृति तीन, अर्थ लिखें संक्षेप से।

भ्रमर कमल रस लीन, अमृत रस नित पीवहीं।।

चौपाई

‘भूः’ परमेश्वर प्राण आधारा,

प्राण रूप से सकल पसारा।

‘भुवः’ शब्द का अर्थ अपाना,

सबके कष्ट कटे भगवाना।

‘स्वः’ बखाने मुनिवर व्याना,

व्यापक विश्वाधार समाना।

तैत्तिरीय मुनि धर्म स्वरूपा,

भक्तन हित यह अर्थ निरूपा।

सविता है उत्पादन कर्ता,

सुख का दाता दुःख निवर्ता।

‘देवस्य’ परयोजन गहिये,

दिवा रूप सुख साधन लहिये।

जिंह पावन की सबको आशा,

जिंह ते पूरन हो अभिलाषा।

सब से श्रेष्ठ स्वीकारन जोगा,

कहें ‘वरेण्यम्’ आरज लोगा।

दोहा

            भर्गः नाम सराहिये, चेतन ब्रह्म स्वरूप।

            पतितन को पावन करे, सुन्दर शुद्ध अनूप।।

चौपाई

‘तत्’ उसको ‘धीमहि’ हम धारे

‘यो’ जिसको जगदीश पुकारें।

‘धियः’ बुद्धियाँ ‘नः’ हमारी,

‘प्रचोदयात्’ रु करे सुधारी।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)