०२३ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (१)

तृतीय समुल्लासः

समुल्लास भाग (१)

अथाऽध्ययनाऽध्यापनविधिं व्याख्यास्यामः

दोहा

विद्या शील स्वभाव युत, गुणमणि गुंफित माल।

जग में शेभा देत हैं, गुण भूषण से बाल।।

चौपाई

गुण भूषण बालक के नीके,

स्वर्ण रत्न सब लागें फीके,

गुण से होवे शील स्वभावा,

स्वर्ण पहन अभिमान बढ़ावा।

पतित आत्मा करे सुवर्णा,

निर्मल मन को करे सुवर्णा,

हत्या चोरी अरु अभिमाना,

सोना पद पद विपद निधाना।

शिशु घाती डोलें हत्यारे,

लाखों बालक सोने मारे,

शीलवन्त नर सत्य उपासी,

विद्या प्रेमी वाग्विलासी।

जग उपकारी पर दुखदारी, धन्य धन्य ऐसे नरनारी।

धार सत्य सद्गुण के भूषण, मेटें जग दुख दारिद दूषण।

विद्याविलासमनसो धृतशीलशिक्षाः सत्यव्रता रहितमानमलापहाराः।

संसारदुःखदलनेन सुभूषिता ये, धन्या नरा विहितकर्मपरोपकाराः।।

दोहा

आठ वर्ष के वयस में, पग धारे जिहिकाल।

पुत्री पुत्र पठाइये, पठन हेत चट साल।।

चौपाई

दो दो कोस दूर चट सारी,

बाल बालिका न्यारी न्यारी।

कन्या को सद् नारी पढ़ावे,

सदाचार शिक्षा जहँ पावे।

दुश्चरित्र हों गुरु गुरुआनी,

उचित न उनसे शिक्षा पानी।

ताँते भेजें सद्गुरु पांही,

दोष पाप जिनके मन नाहीं।

संसकार उपनयन करावे,

पाछे गुरु के धाम पठावे।

इह विधि भेजें कन्या बालक,

धर्म जान तिनके प्रतिपालक।

दोहा

सुन्दर प्रान्त एकान्त में, गुरु गृह हो अभिराम।

वहां वटुक विद्या पढ़ें, निवसें आठों याम।।

अंतर हो द्वै कोस का, चटसाला के माँहि।

देखें बालक बालिका इक दुसर को नाँहि।।

कन्या गुरुकुल में करे, महिलाएँ सब काम।

पुरुष दरस वर्जित तहाँ, यही सिद्धि को धाम।।

चौपाई

जब तक पढ़ें कुमार कुमारी,

ब्रह्मचर्य सेवहिं व्रतधारी।

नर नारी का करें न दर्शन,

भाषण चिन्तन वर्जित पर्सन।

विषय कथन अरु मिलन अकेले,

सँग न कबहुं परस्पर खेले। 

यह मैथुन है अष्ट प्रकारा,

ब्रह्मचारी रह इन ते न्यारा।

अध्यापक का है यह कारज,

छात्र बनावें साँचे आरज।

सब वटुकन को ज्ञान समाना,

आसन वासन खान रु पाना।

दारिद हो उत राजकुमारा,

सब से करे समान व्यवहारा।

तपः काल सब बनें तपस्वी, सतवादी बलवान मनस्वी।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)