०२० स. प्र. कवितामृत द्वितीय समुल्लास (४)

द्वितीय समुल्लासः भाग (4)

छप्पय

पुत्र जन्म का उत्सव है, सब ओर बधाई,

घर में मंगलचार नार मिल मंगल गाई।

होम यज्ञ और दान स्वजन में बंटे मिठाई,

जन्म पत्रिका ज्यौंही ब्राह्मण ने दर्साई।

खोटे ग्रह को देख कर, सब के मन व्याकुल हुए।

राख मिला दी खीर में, अपने लालच के लिए।।

छप्पय

पूजा लो करवाय चाँद चौथे ग्रह आया,

चाँदी सोना वस्त्र बहुत सा दान बताया।

बच जायगा बालक है अनुमान लगाया,

नहीं तो मृत्यु होगी बामन ने भरमाया।

मृत्यु हो गई बालक की, बोला यह अनुमान था।

दैव गति ऐसी रही, इस में कोई क्या करे।

सोरठा

मृत्यु पर कुछ बस नहीं, इस के ऐसे कर्म थे।

बचे तो डोंडी पीटते, देखी फुरना मंत्र की।।

चौपाई

इन को पैसा एक न देवे,

जो देवे तो दुगना लेवे।

यदि कर्मों का फल है ऐसा,

तुम काहे का लेते पैसा।

धागे डोरे प्राण बचावें,

इन के अपने क्यों मर जावें।

बालक को यह ज्ञान कराना,

अंध कूप से उसे बचाना।

दोहा

मारण मोहन वशीकरण, सब मिथ्या विश्वास।

चेटी और रसायनी, करें देश का नास।।

चौपाई

बालक को सन्मार्ग लगावें,

ब्रह्मचर्य उपदेश सुनावें।

वीर्यवान तेजस्वी बालक,

हो बलिष्ठ शत्रुन को घालक।।

वीरज रक्षण की शुभ रीति,

विषय भोग में करहिं न प्रीति।

करे न संगति विषयी जन की,

रखें शुद्ध वृत्ति निज मन की।

दूर दूर विषयों से भागे,

नारी दर्शन पर्सन त्यागे।।

विद्या बल और वीर्य बढ़ाए,

समय अमोलक हाथ न आए।

मात पिता का यह शुभ धर्मा,

दे शिशु को शिक्षा सत्कर्मा।

मातृमान और पितृमाना,

शतपथ ब्राह्मण एहि विधि माना।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)