०१९ स. प्र. कवितामृत द्वितीय समुल्लास (३)

द्वितीय समुल्लासः भाग (3)

सोरठा

लूट रहे दिन रात, धूरत कपटी दुष्ट जन। 

होवहि कबहु प्रभात, अंधकार कब दूर हो।।

चौपाई

झाड़ फूँक और जंतर तंतर,

कभी न खाली जावे मंतर।

इतनी मद की बोतल लाओ,

इतने बकरे मुर्ग चढ़ाओ।

नकद नारायण भूषण गहने,

बाँधी गठड़ी कपड़े पहने।

दिन में लूटा ढोल बजाया,

कैसे मुर्गा जाल फँसाया।

भरम भूत की औषध नाहीं,

गिरो न अंधे कूए मांही।

जँह तँह झटकें फिरें अभागे,

भरम भूत है आगे आगे।

ऐसे रोगी चैन न पावें,

ज्योतिषियों के ढिग पुन जावें।

बैठे ज्योतिषि जी महाराजा,

वंचक महां ठगों के राजा।

कवित्त

भोला अंज्जान जाय पूछे किसी ज्योतिषी को,

कहिये महाराज क्या कारण मेरे रोग का।

रहता बीमार हूँ लाचार पैसे पैसे से,

मेरे घर डेरा क्यों पड़ा ऐसा सोग का।

जप दान पूजा करवाता बतलाता है,

क्रूर ग्रह आया तेरी मृत्यु के योग का।।

स्वयं ग्रह खोटा लूट लूट हुआ मोटा यह,   

ढोंग क्या बनाया इसने अपने मोहन भोग का।।

शार्दूल विक्रीड़ित छन्द

भूमि जड़ है जिस प्रकार जग में, वैसे ही सूर्य्यादि हैं।

केवल ताप अरु है प्रकाश इन में, चेतनता कुछ भी नहीं।

क्यों कर यह पुन हर्ष क्रोध करते, देते सुख दुःख यातना।

फैलाया तुमने प्रपंच मिथ्या, रीति यह पाखण्ड की।

प्रश्न

कोई नरपति है सुखी जगत में, दुखिया मानव है कोई।

कोई दीन व्याधि ग्रस्त हीन दुर्बल, कोई शक्ति धर बली।

कितने मल मल हाथ चल बसे, देखी सुख की नहीं घड़ी।

ग्रह गोचर अनुसार चल रही, सृष्टि ज्योतिष सत्य है।

उत्तर

सुक्कृत अरु दुष्कृत्य कर्म करके, भागी सुख दुःख का बने।

रेखा बीज अरु अंक मात्र गणना, विद्या ज्योतिष तथ्य है।

लील्हा फल की झूठ झूठ अतिशय, मिथ्या पत्रा जन्म का।

क्रूर ग्रह दरसाय मात पितु को, ठगना अरु पर वंचना।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)